डॉ .अजय मोहन सेमवाल /देहरादून
सेवा और समर्पण की मिसाल विनोद चमोली
पहाड़ से निकला एक ऐसा नायक जिसने जन सेवा को ही अपना प्रमोशन माना बेदाग स्वच्छ छवि वाले विनोद चमोली समस्या नहीं समाधान की राजनीति करने में विश्वास रखते हैं जो कहते हैं डंके की चोट और कहते हैं, उनकी परिपक्वता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि किसी भी बयान पर उन्हें स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं पड़ती और पार्टी पर जब भी संकट आया वही विनोद चमोली ने अंगद का पांव जमा कर पार्टी के प्रति अपना समर्पण भाव दिखाया।
उत्तराखंड की राजनीति में कुछ नेता केवल राजनीतिक पदों के कारण नहीं, बल्कि अपने संघर्ष और जनसरोकारों के कारण पहचाने जाते हैं। ऐसे नेताओं में एक महत्वपूर्ण नाम है विनोद चमोली।उत्तराखंड की पहाड़ी राजनीति में विनोद चमोली को एक ऐसे जननेता के रूप में देखा जाता है जिनकी पहचान कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी और पहाड़ के प्रति गहरे प्रेम से जुड़ी हुई है। उनका सार्वजनिक जीवन इस बात का संकेत देता है कि उनके लिए राजनीति केवल पद और प्रतिष्ठा का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और अपने क्षेत्र के प्रति जिम्मेदारी निभाने का एक रास्ता है।

उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद यहाँ की राजनीति में कई नए का उदय हुआ। इन नेताओं में विनोद चमोली का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। वे भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और देहरादून क्षेत्र की राजनीति में उनका महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
उन्होंने एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और धीरे-धीरे संगठनात्मक नेतृत्व, नगर प्रशासन तथा विधानसभा राजनीति तक अपनी पहचान स्थापित की।

विनोद चमोली का जन्म 24 अक्टूबर 1961 को उत्तराखंड के पौडी जिले में हुआ। उनके पिता चन्द्रमोहन चमोली भारतीय सेना में अधिकारी थे। सैन्य परिवार में जन्म लेने के कारण उनके जीवन में अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति जैसे गुण प्रारंभ से ही विकसित हुए।
पर्वतीय क्षेत्रों में जीवन की कठिन परिस्थितियों ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। उस समय उत्तराखंड क्षेत्र में विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी थी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी समस्याएँ व्यापक रूप से मौजूद थीं।इन परिस्थितियों ने उनके भीतर समाज के लिए कार्य करने की प्रेरणा उत्पन्न की।
विनोद चमोली ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा उत्तराखंड में प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के रूप में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (PGDBA) प्राप्त किया।
इस शिक्षा ने उन्हें प्रबंधन और प्रशासन की व्यावहारिक समझ प्रदान की। यही प्रबंधकीय कौशल बाद में उनके नगर प्रशासन और राजनीतिक कार्यों में उपयोगी सिद्ध हुआ।
शिक्षा के दौरान ही उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में रुचि दिखाई। वे विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों और छात्र गतिविधियों में सक्रिय रहते थे।
ठेठ पहाड़ी।
विनोद चमोली पहाड़ की उस मिट्टी से जुड़े नेता हैं जिनके व्यक्तित्व में केवल राजनीति नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के प्रति गहरा भावनात्मक लगाव दिखाई देता है। जब भी पहाड़ के संघर्ष, आंदोलनों और वहां के लोगों की समस्याओं की चर्चा होती है, तो उनके शब्दों में केवल तर्क नहीं बल्कि दर्द और संवेदना भी झलकती है। यही कारण है कि कई बार आंदोलन की बात करते-करते उनकी आंखों से आंसू निकल आते हैं। ये आंसू केवल भावुकता के नहीं, बल्कि उस पीड़ा और संघर्ष के प्रतीक हैं जिसे पहाड़ के लोगों ने वर्षों तक झेला है।
विनोद चमोली का पहाड़ प्रेम केवल भाषणों तक सीमित नहीं है। वे उन नेताओं में से हैं जिन्होंने पहाड़ की समस्याओं को नजदीक से देखा और महसूस किया है। पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार की कमी, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता जैसी समस्याएं उन्हें भीतर तक विचलित करती हैं। जब वे इन मुद्दों पर बात करते हैं तो उनके शब्दों में एक सच्ची चिंता दिखाई देती है। ऐसा लगता है जैसे वे केवल एक जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि पहाड़ के हर परिवार के दर्द को अपनी पीड़ा मानते हों।
पहाड़ के आंदोलनों की चर्चा आते ही उनके मन में उस संघर्ष की स्मृतियां जाग उठती हैं जिसमें हजारों लोगों ने अपने अधिकारों और पहचान के लिए आवाज उठाई। उन दिनों की कठिनाइयों और बलिदानों को याद करके उनका मन भावुक हो जाता है। यही कारण है कि उनके आंसू पहाड़ की उस सामूहिक स्मृति का प्रतीक बन जाते हैं, जिसने इस क्षेत्र की पहचान को आकार दिया।
विनोद चमोली का मानना है कि पहाड़ का विकास केवल योजनाओं और बजट से नहीं होगा, बल्कि वहां के लोगों की भावनाओं, संस्कृति और जीवनशैली को समझकर ही सही दिशा में काम किया जा सकता है। वे बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों को मजबूत किया जाए ताकि लोगों को अपना घर छोड़कर मैदानी इलाकों की ओर पलायन न करना पड़े।
उनके व्यक्तित्व का सबसे खास पहलू यह है कि वे अपने लोगों से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। जब वे पहाड़ की स्थिति देखते हैं—खाली होते गांव, संघर्ष करते किसान और सीमित संसाधनों में जीवन बिताते लोग—तो उनके मन में एक गहरी वेदना उत्पन्न होती है। यही वेदना उनके संकल्प को भी मजबूत बनाती है कि वे अपने क्षेत्र के विकास के लिए निरंतर प्रयास करते रहें।
राजनीतिक जीवन की शुरुआत
विनोद चमोली ने वर्ष 1985 में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। उस समय भाजपा देश के कई राज्यों में संगठन विस्तार की प्रक्रिया में थी।
भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में कार्य करना शुरू किया। उन्होंने पार्टी की विचारधारा और नीतियों को जनता तक पहुँचाने का कार्य किया।उनकी सक्रियता और संगठनात्मक क्षमता के कारण उन्हें जल्द ही पार्टी में विभिन्न जिम्मेदारियाँ दी जाने लगीं।विनोद चमोली ने भाजपा संगठन में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।
प्रमुख पद
जिला मंत्री – भारतीय जनता युवा मोर्चा
जिलाध्यक्ष – भारतीय जनता युवा मोर्चा
प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य – युवा मोर्चा
गढ़वाल मंडल प्रभारी – युवा मोर्चा
जिलाध्यक्ष – उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति
प्रदेश मंत्री – भाजपा उत्तराखंड
उपाध्यक्ष – महानगर भाजपा देहरादून
अध्यक्ष – महानगर भाजपा देहरादून
प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य – भाजपा
इन पदों पर रहते हुए उन्होंने संगठन के विस्तार और कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आंदोलनों में भूमिका
रामजन्मभूमि आंदोलन।
विनोद चमोली राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े रहे और इस आंदोलन में संयोजक के रूप में कार्य किया।उन्होंने भाजपा की एकता यात्रा में भी सक्रिय भूमिका निभाई। इस यात्रा का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रवाद का संदेश फैलाना था। विनोद चमोली की राम जन्मभूमि आंदोलन में भागीदारी उनके राजनीतिक जीवन के प्रारंभिक और महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक मानी जा सकती है।इस आंदोलन ने उन्हें व्यापक राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक कौशल और जनसंपर्क की क्षमता प्रदान की। आगे चलकर यही अनुभव उनके लिए उत्तराखंड राज्य आंदोलन, नगर प्रशासन और विधानसभा राजनीति में उपयोगी सिद्ध हुए।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन
विनोद चमोली उत्तराखंड के वरिष्ठ भाजपा नेता और वर्तमान में धर्मपुर विधानसभा (देहरादून) से विधायक हैं। वे उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक रहे हैं और इस आंदोलन के दौरान उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA / RASUKA) लगाया गया था।उत्तराखंड (तब उत्तरांचल) को अलग राज्य बनाने की मांग 1950-60 के दशक से चली आ रही थी, लेकिन यह 1990 के दशक में उग्र रूप ले लिया। 1994 में आंदोलन चरम पर पहुंचा, जिसमें छात्रों, महिलाओं, युवाओं और सामान्य जनता ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर 2 अक्टूबर 1994 को पुलिस फायरिंग में कई आंदोलनकारी शहीद हुए, जिसे आंदोलन का सबसे दर्दनाक अध्याय माना जाता है।
इस आंदोलन को दबाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार (तब मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में) ने कठोर कदम उठाए। कई नेताओं और कार्यकर्ताओं पर विभिन्न धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए। कुछ चुनिंदा प्रमुख कार्यकर्ताओं पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) लगा दिया गया, जो एक preventive detention कानून है और इसमें बिना सामान्य मुकदमे के लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता है।विनोद चमोली उस समय उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सक्रिय युवा नेता थे।3 सितंबर 1994 को उन पर रासुका (NSA) लगाकर गिरफ्तार किया गया उस समय चमोली की उम्र मात्र 33 वर्ष थी।उन्हें बरेली जेल में बंद कर दिया गया, जहां उन्हें नेहरू वार्ड में अलग-थलग रखा गया।जेल में उन्हें आतंकवादी की तरह व्यवहार किया गया — कोई मुलाकात की इजाजत नहीं, कोई जानकारी बाहर-भीतर नहीं जा सकती थी।NSA इसलिए लगाई गई क्योंकि सरकार उन्हें आंदोलन का प्रमुख “खतरा” मान रही थी और सोचती थी कि वे आंदोलन को और उग्र बनाने की कोशिश कर सकते हैं।उत्तराखंड आंदोलन के दौरान पूरे राज्य में सिर्फ दो व्यक्तियों पर ही NSA लगाई गई थी।
पूर्व विधायक राजेंद्र शाह
विनोद चमोली
आंदोलन के बाद 2000 में उत्तराखंड अलग राज्य बना। विनोद चमोली बाद में राजनीति में सक्रिय रहे, भाजपा से जुड़े और कई बार प्रवक्ता, विधायक आदि पदों पर रहे। वे आज भी उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय हैं और मूल निवास, डेमोग्राफी जैसे मुद्दों पर मुखर रहते हैं।उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में विनोद चमोली ने सक्रिय भूमिका निभाई और आंदोलन के दौरान दो बार जेल भी गए।
नगर राजनीति में प्रवेश
विनोद चमोली ने चुनावी राजनीति में प्रवेश करते हुए नगर पालिका स्तर से अपने प्रशासनिक जीवन की शुरुआत की।वे 1988 से 1993 तक देहरादून नगर पालिका परिषद के सदस्य रहे।वे 1997 से 1998 तक नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष रहे।
देहरादून नगर निगम के महापौर
पहला कार्यकाल (2008–2013)
वे 2008 में देहरादून नगर निगम के महापौर चुने गए।
इस दौरान उन्होंने शहर के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए सड़क निर्माण और मरम्मत,सफाई व्यवस्था में सुधार पार्कों का विकास नगर निगम प्रशासन का आधुनिकीकरण इत्यादि चहुमुखी विकास के काम किए।
दूसरा कार्यकाल (2013–2018)
2013 में वे पुनः महापौर चुने गए।
लगातार दो बार महापौर चुने जाना उनके जनाधार को दर्शाता है।
राष्ट्रीय स्तर की भूमिका
नगर प्रशासन में उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें All India Council of Mayors का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया।उन्होंने 2015 से 2018 तक इस पद पर कार्य किया।नगर प्रशासन में सफलता के बाद उन्होंने विधानसभा राजनीति में प्रवेश किया। 2017 से 2022 तक धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। रोम इसी क्रम में वे दूसरी बार2022 में वे पुनः धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए।
विधायक के रूप में विकास कार्य
विनोद चमोली ने विधायक के रूप में कई विकास कार्यों को आगे बढ़ाया।सड़कों और पुलों के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया गया।क्षेत्र में पेयजल योजनाओं को लागू किया गया।विद्यालयों के विकास और शिक्षा सुविधाओं को बेहतर बनाने का प्रयास किया गया।स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए कई योजनाएँ शुरू की गईं।
ब्यूरोक्रेसी पर पकड़
पहाड़ की राजनीति में विनोद चमोली की पहचान केवल एक जननेता के रूप में ही नहीं, बल्कि ऐसे नेता के रूप में भी की जाती है जो प्रशासनिक तंत्र यानी ब्यूरोक्रेसी से काम लेना भली-भांति जानते हैं। लंबे राजनीतिक अनुभव और क्षेत्रीय मुद्दों की गहरी समझ के कारण उन्होंने शासन-प्रशासन की कार्यशैली को करीब से देखा और समझा है। यही कारण है कि अक्सर कहा जाता है कि उनकी ब्यूरोक्रेसी पर अच्छी पकड़ है और वे जानते हैं कि किस स्तर पर किस प्रकार से निर्णयों को आगे बढ़ाया जा सकता है।
विनोद चमोली की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि वे केवल मांग उठाने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उस मांग को प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से पूरा करवाने की क्षमता भी रखते हैं। वे जानते हैं कि किसी योजना या जनहित के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए किन विभागों से संवाद करना होता है, किन नियमों और प्रक्रियाओं को समझना जरूरी है और किस प्रकार से प्रशासन को सक्रिय किया जा सकता है। इसी अनुभव के कारण वे अधिकारियों के सामने अपनी बात तथ्यों और अनुभव के साथ रखते हैं।
कई मौकों पर ऐसा देखा गया है कि जब जनता से जुड़े मुद्दों पर प्रशासनिक ढिलाई दिखाई देती है, तो विनोद चमोली अपने अनुभव और दृढ़ता के साथ अधिकारियों के सामने मजबूती से खड़े होते हैं। उनके तर्क, क्षेत्रीय अनुभव और जनभावनाओं की समझ इतनी प्रभावशाली होती है कि कई बार प्रशासनिक अधिकारियों को भी उनकी बात मानने और निर्णय लेने के लिए प्रेरित होना पड़ता है। इस दृष्टि से कहा जाता है कि उन्होंने कई बार अपने अनुभवों और स्पष्ट दृष्टिकोण के कारण ब्यूरोक्रेसी को भी अपनी बात स्वीकार करने के लिए मजबूर किया है।
इस प्रकार विनोद चमोली की राजनीतिक शैली का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे राजनीति और प्रशासन के बीच संतुलन बनाकर काम करने में विश्वास रखते हैं। उनकी प्रशासनिक समझ, अनुभव और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता उन्हें ऐसा नेता बनाती है जो केवल मुद्दे उठाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन्हें समाधान तक पहुंचाने की क्षमता भी रखता है। यही कारण है कि उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो ब्यूरोक्रेसी से प्रभावी ढंग से काम करवाना जानते हैं और विकास के कार्यों को जमीन तक पहुंचाने का प्रयास करते रहते हैं।
स्वच्छ ईमानदार छवि जन सेवा ही मेरा प्रमोशन।
चमोली को पहाड़ की राजनीति में एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जिनकी पहचान ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और जनसेवा के प्रति समर्पण से जुड़ी हुई है। उनका राजनीतिक जीवन केवल पद और प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने हमेशा अपने कार्यों के माध्यम से जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता बनाई है। यही कारण है कि लोग उन्हें एक कर्मप्रधान नेता के रूप में जानते हैं, जो राजनीति को सेवा का माध्यम मानते हैं, न कि केवल सत्ता प्राप्ति का साधन।
कई राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि विनोद चमोली की सबसे बड़ी ताकत उनकी साफ-सुथरी छवि और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता है। वे उन नेताओं में से हैं जो परिस्थितियों के अनुसार अपने विचारों को बदलने के बजाय अपने मूल्यों पर दृढ़ रहते हैं। राजनीति में अक्सर देखा जाता है कि पदोन्नति या संगठनात्मक लाभ पाने के लिए कई लोग समझौते करते हैं, लेकिन विनोद चमोली का स्वभाव ऐसा नहीं रहा। वे अपने सिद्धांतों और ईमानदारी के साथ काम करना अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।
इसी कारण कई बार यह भी चर्चा होती है कि उनकी स्पष्टवादिता और ईमानदार कार्यशैली के कारण उन्हें संगठन में अपेक्षित “प्रमोशन” या बड़े पदों से दूर रखा जाता रहा है। लेकिन यह स्थिति उनके स्वभाव या कार्यशैली को कभी प्रभावित नहीं कर पाई। वे मानते हैं कि असली सम्मान जनता के बीच मिलता है, न कि केवल पदों से। इसलिए वे पद की अपेक्षा अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी को अधिक महत्व देते हैं।
विनोद चमोली का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ जनता के बीच लगातार सक्रिय रहते हैं। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि जब पार्टी की औपचारिक बैठकों या कार्यक्रमों का समय होता है, उसी दौरान वे किसी गांव, क्षेत्र या जनसमस्या को लेकर लोगों के बीच मौजूद होते हैं। उनके लिए जनसेवा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य है।
वे मानते हैं कि राजनीति का मूल उद्देश्य जनता की समस्याओं को समझना और उनका समाधान करना है। इसलिए वे अक्सर विधानसभा में जाकर लोगों की समस्याएं सुनते हैं, उनके साथ संवाद करते हैं और प्रशासन तक उनकी आवाज पहुंचाने का प्रयास करते हैं। यह कार्यशैली उन्हें आम लोगों के और करीब ले जाती है।
विनोद चमोली की यही विशेषता उन्हें एक अलग पहचान देती है—एक ऐसा नेता जो पद से अधिक कर्म को महत्व देता है। ईमानदारी, सादगी और जनसेवा के प्रति उनका समर्पण यह दर्शाता है कि उनके लिए राजनीति व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का मार्ग है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि भले ही उन्हें राजनीतिक पदों की दृष्टि से उतना “प्रमोशन” न मिला हो, लेकिन जनता के दिलों में जो स्थान उन्हें मिला है, वही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनके व्यक्तित्व से यह संदेश मिलता है कि सच्ची राजनीति वही है जिसमें सत्ता से अधिक सेवा का भाव हो।
