डॉ.अजय मोहन सेमवाल/देहरादून 
देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशी नवदीप राणा ने जब छात्र घोषणापत्र रखा, तो वह सामान्य चुनावी कागज से अलग इसलिए लगा क्योंकि उसमें परिसर की पुरानी शिकायतों को गिनाने के बाद उनके सामने काम की रूपरेखा थी। शिक्षा, सुरक्षा, प्लेसमेंट और महिला सुरक्षा—ये शब्द हर चुनाव में दोहराए जाते हैं, लेकिन यहां इन्हें ई-पुस्तकालय, स्मार्ट कक्षा, वाई-फाई, स्वच्छ शौचालय, सीसीटीवी, बेहतर रोशनी, मजबूत प्लेसमेंट सेल, इंटर्नशिप, कैंपस भर्ती, पिंक बूथ, हेल्पलाइन और आत्मरक्षा प्रशिक्षण जैसी ठोस मांगों से जोड़ा गया। संदेश साफ था कि छात्र राजनीति केवल बैनर और नारे नहीं, उस रोजमर्रा की जिंदगी का हिसाब होनी चाहिए जिसमें छात्र पढ़ते, इंतजार करते और कभी असुरक्षित महसूस करते हैं।
नवदीप राणा बडकोट-पुरोला के हैं। पिता किसान हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं। उन्होंने विज्ञान स्नातक के साथ हिंदी और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। पिछले आठ वर्षों से वे इसी महाविद्यालय में सक्रिय रहे हैं। समर्थक इसी निरंतरता को उनकी सबसे बड़ी पूंजी बताते हैं—वह उपस्थिति जो चुनाव घोषित होने से पहले भी कक्षा, पुस्तकालय और छोटी प्रशासनिक लड़ाइयों में दिखती रही। इस बार आर्यन संगठन से अमित सिंह और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन से सौरभ सेमवाल भी मैदान में हैं। मुकाबला त्रिकोणीय है, पर बहस का केंद्र फिर वही है—कौन छात्र हित को मौसम से बाहर भी अपना काम समझता है।

डीएवी पीजी कॉलेज उत्तराखंड की छात्र राजनीति का सबसे देखा-सुना मंच रहा है। यहां की कुर्सी पूरे प्रदेश में संदेश देती है। अभाविप का इस परिसर से लंबा रिश्ता है। वर्षों तक अध्यक्ष पद पर संगठन की पकड़ बनी रही, 2023 में आर्यन संगठन ने वह क्रम तोड़ा और 2025 में अभाविप ने ऋषभ मल्होत्रा के रूप में पद वापस लिया। वह वापसी केवल एक जीत नहीं, उस दावे की पुनर्स्थापना थी कि यह महाविद्यालय संगठन का अभेद किला रहा है और फिर से उसी दिशा में मुड़ सकता है। 2026 का घोषणापत्र उसी दावे को आगे बढ़ाने का प्रयास है।

उत्तराखंड के 2025 के छात्र संघ चुनाव उस दावे को आंकड़ों में बदल चुके हैं। प्रदेश के दर्जनों महाविद्यालयों में अभाविप ने अध्यक्ष सहित कई पद जीते। कई जगह अध्यक्ष पद निर्विरोध गया। यह नतीजा संगठन के अनुसार उस साल भर की मेहनत का फल था जिसमें बस पास, छात्रवृत्ति, परीक्षा केंद्र, छात्रावास और शौचालय जैसी छोटी फाइलें बड़ी राजनीति से पहले आती हैं। चुनाव के दिन झंडा लहराना आसान है। कठिन वह साधना है जो गर्मी और परीक्षा के महीनों में इकाई बैठक में चलती है और सामान्य कार्यकर्ता को नेतृत्व तक ले जाती है।
यही साधना देश के दूसरे परिसरों में भी दिखाई दी है। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ लंबे समय से देश की सबसे चर्चित छात्र प्रयोगशाला है। हाल के चक्रों में अभाविप ने केंद्रीय पैनल के अधिकांश प्रमुख पद जीते। 2025 में अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पर बड़ी बढ़त रही। 2026 में भी तीन प्रमुख पद संगठन के खाते में गए, उपाध्यक्ष पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी हुए। मत प्रतिशत घटते-बढ़ते रहे, पर शीर्ष पर संगठन की निरंतरता बनी रही। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में सात वर्षों बाद अभाविप ने अध्यक्ष से खेल सचिव तक प्रमुख पद Sweep किए। पंजाब विश्वविद्यालय में दशकों बाद अध्यक्ष पद पहली बार संगठन के नाम दर्ज हुआ। पटना विश्वविद्यालय में महिला अध्यक्ष का ऐतिहासिक चुनाव अभाविप के बैनर तले हुआ। केरल के त्रिपुनिथुरा सरकारी संस्कृत महाविद्यालय में वाम छात्र संगठन के पुराने गढ़ में प्रमुख सीटें अभाविप के खाते में गईं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे वैचारिक गढ़ में केंद्रीय पैनल पर संघर्ष जारी रहा, पर काउंसलर सीटों पर संगठन ने उल्लेखनीय संख्या में सेंध लगाई। ये परिसर भाषा, समाज और राजनीति में एक-दूसरे से दूर हैं, फिर भी एक पीढ़ी उनसे एक ही सवाल पूछ रही है—नौकरी, सुरक्षा, सुविधा और सम्मान।
अभाविप इसी सवाल को अपने कार्यकर्ता तंत्र से जोड़ती है। संगठन स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन कहता है और इस दावे को इकाइयों के विस्तार पर टिकाता है। सामान्य कार्यकर्ता से इकाई, महानगर और चुनावी प्रत्याशी तक का सफर धीमा होता है, पर उसी धीमेपन को वह अपनी शक्ति बताता है। नवदीप का आठ वर्ष का परिसर जीवन उसी प्रक्रिया का स्थानीय चेहरा है। किसान घर और संघ पृष्ठभूमि का उल्लेख इसलिए आता है कि यह कहा जा सके कि संगठन केवल महानगर के मध्य वर्ग का मंच नहीं। कर्मठता यहां नियमित संपर्क और फाइल आगे बढ़ाने का नाम है। जुझारूपन उन क्षणों का नाम है जब प्रदर्शन या प्रशासन के सामने डटे रहना पड़ता है। हर संगठन अपने कार्यकर्ताओं को वीर कहता है। अंतर दीर्घ उपस्थिति का है—कौन चुनाव के पोस्टर से पहले भी परिसर में मिलता है।
घोषणापत्र के दो बिंदु इस उपस्थिति को विशेष अर्थ देते हैं। महिला सुरक्षा को पिंक बूथ, हेल्पलाइन और आत्मरक्षा से जोड़ना भावनात्मक नारा नहीं, उस वास्तविकता का स्वीकार है जिसमें देर शाम की कक्षा और अंधेरे कोने छात्रा की पढ़ाई का हिस्सा बन जाते हैं। सीसीटीवी और रोशनी उसी श्रृंखला की कड़ियां हैं। प्लेसमेंट सेल, इंटर्नशिप और कैंपस भर्ती उस दूसरी वास्तविकता से टकराते हैं जिसमें डिग्री मिलने के बाद रास्ता अक्सर धुंधला रहता है। पारंपरिक कला और विज्ञान स्नातकों के लिए यह धुंध और भी मोटी होती है। यदि ये वादे कुर्सी मिलने के बाद कागज पर रह गए तो आलोचना स्वाभाविक होगी। यदि आंशिक काम भी दिखे तो वह अगली पीढ़ी के कार्यकर्ताओं की पूंजी बनेगा। छात्र राजनीति का हिसाब इसी तरह कठोर है।
विपक्ष के पास अपना तर्क है। आर्यन संगठन 2023 में डीएवी की सबसे बड़ी कुर्सी छीन चुका है। राष्ट्रीय छात्र संघ राज्य और राष्ट्रीय परिसरों में पुराना दावेदार रहा है, हालांकि बड़े विश्वविद्यालयों में उसका हालिया प्रदर्शन कमजोर रहा। त्रिकोणीय मुकाबले में वोट बंट सकते हैं। ऐसे में संपर्क और विश्वसनीयता निर्णायक हो सकती है। यह आक्षेप भी पुराना है कि कुछ संगठन वर्ष भर छात्र समस्या पर चुप रहते हैं और चुनाव निकट आने पर चंदा और भीड़ जुटाने लगते हैं। इसे सिद्ध या खंडित करना परिसर के छात्रों का काम है। वे जानते हैं कौन से चेहरे शुल्क, बस और पुस्तकालय की शिकायत पर साल भर दिखते हैं।
2025 की व्यापक प्रदेशीय जीत के बाद 2026 का डीएवी चुनाव अभाविप के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है। टूटी श्रृंखला जोड़ने के बाद उसे थामना अलग परीक्षा है। नवदीप राणा का घोषणापत्र उसी परीक्षा की पहली पंक्ति है। देश के दूसरे परिसरों का अनुभव यही सिखाता है कि छात्र चुनाव स्थानीय होते हुए भी एक पीढ़ी की बेचैनी से जुड़े होते हैं—वह पीढ़ी जो नारे से जल्दी नहीं मानती और परिणाम मांगती है। अभाविप का दावा है कि वह इसी पीढ़ी से बात कर रही है। आलोचक कहते हैं कि बात के पीछे वैचारिक परियोजना है। दोनों बातें साथ चल सकती हैं। अंत में छात्र उसी को चुनते हैं जो उनकी फाइल आगे बढ़ाए।
बडकोट-पुरोला से निकला छात्र, आठ वर्ष की सक्रियता और एक लिखित ब्लूप्रिंट—ये व्यक्तिगत विवरण हैं। असली कसौटी वे वाक्य हैं जो पुस्तकालय, शौचालय, प्लेसमेंट और पिंक बूथ से जुड़े हैं। डीएवी का प्रांगण उन वाक्यों को वोट में बदलेगा या उन्हें कागज पर छोड़ देगा, यही इस चुनाव की असली कहानी होगी। झंडा गाड़ना संगठन के इतिहास का हिस्सा रहा है। झंडे के नीचे काम दिखना उसकी अगली परीक्षा है। उसी परीक्षा में नवदीप राणा का घोषणापत्र और अभाविप की लंबी साधना अब तौली जाएगी।

