डॉ .अजय मोहन सेमवाल
सांसद निधि खर्च मेरी मर्जी
-उत्तराखंड के सांसदो द्वारा सांसद निधि दूसरे राज्यों मैं खर्च करने की खबर से उत्तराखंड की सियासत में भूचाल है उत्तराखंड के सांसदों के द्वारा इस निधि को खर्च करने पर उनके द्वारा कोई समुचित उत्तर तो नहीं दिया गया परंतु ऐसा प्रतीत होता है मानो वे कह रहे हो कि मेरी मर्जी में चाहे यहां खर्च करूं मैं चाहे वहां खर्च करूं।
राज्य बनने के 25 वर्षों के बाद भी उत्तराखंड भूगोल, सीमित संसाधनों और प्रवासन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, वहां के सांसदों की ओर से (सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना) निधि का एक हिस्सा पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश और हरियाणा में खर्च करने का मामला जनवरी 2026 में RTI के माध्यम से सामने आया। यह खुलासा न केवल योजना के दुरुपयोग का संकेत देता है, बल्कि राज्य की जनता के साथ विश्वासघात की भावना पैदा करता है। जब पहाड़ी गांवों में पेयजल, सड़कें, स्वास्थ्य केंद्र और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी अधर में लटकी हैं, तब उनके चुने हुए प्रतिनिधि अपनी निधि को दूर के जिलों में ‘दान’ की तरह बांट रहे हैं—यह सवाल उठता है कि क्या सांसदों की प्राथमिकता राज्य का विकास है या व्यक्तिगत/राजनीतिक एजेंडा?MPLADS योजना 1993 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य सांसदों को अपने निर्वाचन क्षेत्र में स्थानीय विकास कार्यों के लिए प्रतिवर्ष ₹5 करोड़ (2024-25 से बढ़ाकर) उपलब्ध कराना था। दिशानिर्देश स्पष्ट हैं: निधि मुख्य रूप से निर्वाचन क्षेत्र में खर्च होनी चाहिए ।कुछ विशेष प्रावधानों के तहत—जैसे राष्ट्रीय एकता, सद्भावना, आपदा राहत या पूर्व मंजूर प्रस्ताव—सीमित राशि (सामान्यतः ₹25 लाख प्रति वर्ष तक) बाहर खर्च करने की अनुमति है। लेकिन RTI से प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड के सांसदों ने लगभग ₹1.28 करोड़ की राशि UP और हरियाणा में आवंटित की, जिसमें ट्यूबवेल, स्कूल कक्षाएं, सामुदायिक भवन, जल निकासी और पेयजल योजनाएं शामिल हैं।
उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां कुल MPLADS आवंटन का बड़ा हिस्सा भी उपयोग नहीं हो पा रहा (2024-2026 तक 8 सांसदों को ₹95.90 करोड़ मिले, लेकिन दिसंबर 2025 तक मात्र 18% खर्च), बाहर खर्च करना विकास की उपेक्षा का स्पष्ट संदेश देता है।
RTI खुलासे का विवरण।
RTI कार्यकर्ता नदीम उद्दीन और अन्य द्वारा प्राप्त दस्तावेजों (MoSPI और राज्य स्तरीय नोडल एजेंसी से) से मुख्य बिंदु निम्न हैं।कुल प्रभावित राशि: ₹1.28 करोड़ (कुछ रिपोर्टों में ₹1.28 करोड़ से अधिक का उल्लेख)
प्रमुख सांसद: टिहरी गढ़वाल लोकसभा सांसद माला राज्यलक्ष्मी शाह सबसे आगे। उन्होंने 2024-25 में उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में अकेले ₹1 करोड़ की राशि मंजूर की। कार्यों में फुटपाथ, पैदल मार्ग, पेयजल योजनाएं और अन्य बुनियादी ढांचा शामिल। कुछ पुराने प्रस्ताव (2010-2016 के बीच के) भी 2025 में मंजूर होकर खर्च हुए।
राज्यसभा सांसद नरेश बंसल: हरियाणा के चरखी दादरी और करनाल जिलों में ₹25 लाख की राशि स्कूल, कॉलेज और सामुदायिक भवन निर्माण के लिए।नरेश बंसल: उन्होंने भी सीधे प्रतिक्रिया नहीं दी। BJP का सामान्य रुख रहा कि निधि का उपयोग पारदर्शी और नियमों के अनुसार हुआ।कुल मिलाकर, सांसदों ने व्यक्तिगत स्तर पर चुप्पी साधी, जबकि पार्टी स्तर पर इसे “नियमों के दायरे में” बताया गया।
कांग्रेस का तीखा हमला………
उत्तराखंड कांग्रेस ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सबसे तीखी प्रतिक्रिया दी:”जिन सांसदों को उत्तराखंड की जनता ने चुना, अगर वही अपनी निधि दूसरे राज्यों में खर्च करें तो यह जनता की भावनाओं और भरोसे के साथ सीधा खिलवाड़ है। जनता के वोट की कीमत नहीं समझते ये सांसद। उत्तराखंड के गांवों में पानी, सड़क नहीं है, लेकिन सांसद UP-हरियाणा में ‘दानवीर’ बन रहे हैं।”
गोदियाल ने देहरादून, टिहरी, अल्मोड़ा, पौड़ी और चमोली जैसे जिलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में जर्जर सड़कें, पेयजल संकट और प्रवासन की समस्या बनी हुई है। उन्होंने इसे “जनता से धोखा” करार दिया और जांच की मांग की।
अन्य कांग्रेस नेताओं और RTI कार्यकर्ताओं ने इसे “उत्तराखंड की उपेक्षा” कहा। विपक्ष का आरोप है कि यह पैसा पहाड़ों के लिए था, न कि बाहर “लुटाने” के लिए।
यह मामला मात्र ₹1.28 करोड़ का नहीं; यह लोकतंत्र में प्रतिनिधियों की जवाबदेही का है। सांसदों को चाहिए कि वे निधि का अधिकतम उपयोग अपने क्षेत्र में करें, पारदर्शिता बनाए रखें और जनता को स्पष्टीकरण दें। विपक्ष की मांग है कि ऐसी अनियमितताओं पर स्वतंत्र जांच हो, नियम सख्त किए जाएं और उपयोग दर बढ़ाने के लिए प्रशासनिक सुधार हों।
उत्तराखंड की जनता ने सांसदों को चुना है ताकि वे पहाड़ों की आवाज दिल्ली तक पहुंचाएं, न कि दिल्ली/आगरा/हरियाणा की सुविधाएं पहाड़ों से चुराएं। पहाड़ों में आज भी बदहाल व्यवस्थाएं माननीयो का मूँह ताक रही हैं कि कब सुधरेंगे हालत अब नहीं तो कब? परंतु हमारे सांसद राज्य के विकास के स्थान पर अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को अत्यधिक बल दे रहे हैं राज्य की सांसद निधि का पैसा ब्रिटिश हुकूमत के इतिहास को स्मरण करवाता है जहां ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में पैसा कमाकर कर इसका प्रयोग ब्रिटेन के विकास के लिए किया। भारत को सिर्फ आय.का एक साधन बनाकर रखा। उत्तराखंड की जनता सांसदों से पूछ रही है कि हमने आपको उत्तराखंड के विकास के लिए संसद में पहुंचाया ताकि आप उत्तराखंड के विकास का रोड मैप रख सके परंतु स्थिति विपरीत है और आज भी पहाड़ की पानी पहाड़ की जवानी के बाद आप पहाड़ का पैसा भी पहाड़ के काम नहीं आ रहा है जिसके कारण पहाड़ की आर्थिक की धीरे-धीरे कमजोर हो रही है जो पलायन बेरोजगारी को बढ़ा रही है । पहाड़ी राज्य पर दिन प्रतिदिन कर्ज का बोझ बढ़ रहा है यह मामला उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के लिए गंभीर है जहां संसाधन सीमित हैं और विकास बड़ी जरूरत है 1.28 करोड़ रूपया बाहर खर्च होना छोटी राशि नहीं है यह जनता के विश्वास के साथ बड़ा छलावा

