डॉ अजय मोहन सेमवाल/देहरादून
पुष्कर सिंह धामी के प्रति ऐसी वफादारी का उदाहरण प्रस्तुत किया, जो रामायण के भरत की भगवान राम के प्रति अटूट समर्पण से मेल खाती है। जीत हाथ में होने पर भी उन्होंने पार्टी के अनुरोध पर चुनाव न लड़कर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को कुर्बान किया, संगठन और नेता के सम्मान को सर्वोपरि रखा—एक दुर्लभ राजनीतिक त्याग, जो आज के युग में प्रेरणा बन गया है।
केदारनाथ उत्तराखंड की राजनीति और आस्था का केंद्र है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का इस पावन धाम से गहरा लगाव पूरे देश को प्रेरित करता है। 2013 की भयंकर आपदा के बाद से लेकर आज तक मोदी जी ने केदारनाथ को न केवल पुनर्निर्माण किया, बल्कि इसे विश्वस्तरीय तीर्थ स्थल बनाने का संकल्प लिया। यह सीट भाजपा की प्रमुख विधानसभा सीटों में से एक है, जहां पूरे देश का ध्यान रहता है। हर चुनाव यहां सिर्फ स्थानीय मुद्दों का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हिंदुत्व और विकास का प्रतीक बन जाता है।
केदारनाथ विधानसभा सीट हिंदुत्व का एपीसेंटर है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा केदारनाथ धाम यहां है। पंच केदार में तीन मंदिर (केदारनाथ, तुंगनाथ, मद्महेश्वर) इसी क्षेत्र में हैं। यह देवभूमि उत्तराखंड का प्रतीक है। भाजपा के लिए केदारनाथ चुनाव जीतना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि सनातन धर्म, हिंदू आस्था और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रतीक है। जब मोदी जी खुद यहां ध्यान करते हैं और विकास करते हैं, तो इस सीट की जीत भाजपा की हिंदुत्व नीति की राष्ट्रीय पुष्टि बन जाती है। हार का मतलब देशभर में सनातन विरोधी ताकतों को बल मिलना होगा।
2017, 2022 और 2024 उपचुनाव में भाजपा ने यहां मजबूत पकड़ दिखाई। शैला रानी रावत से आशा नौटियाल तक, भाजपा ने स्थानीय महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाया। लेकिन निर्दलीय ताकत और कांग्रेस की चुनौती के बीच यह सीट हमेशा चर्चित रहती है। पूरे देश का ध्यान रहता है क्योंकि केदारनाथ जीतना मतलब हिंदुत्व की जीत, पर्यटन-आस्था संतुलन की जीत और मोदी विजन की जीत है।
आज जब 2027 के चुनाव नजदीक हैं, भाजपा के लिए केदारनाथ को हर हाल में जीतना राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का सवाल है। यह सीट हिंदुत्व के एपीसेंटर के रूप में भाजपा को सनातन भारत का प्रहरी बनाने मैं इस सीट का बड़ा महत्व है।
2024 के उपचुनाव में जनता मान बैठी थी कि अब कुलदीप रावत इतिहास लिखने जा रहे हैं परंतु 2024 के उपचुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और पार्टी संगठन के कहने पर चुनाव नहीं लड़ा, जबकि उनके 13 हजार से अधिक कट्टर समर्थक और खुद उनका दावा था कि वे 35 हजार वोटों से जीत सकते हैं। यह समर्पण था – भाजपा के सम्मान और अनुशासन के लिए व्यक्तिगत जीत को कुर्बान करना।
आज 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में कुलदीप रावत का नाम फिर चर्चा में है। यदि उन्हें टिकट मिला तो वे भाजपा को मजबूत जीत दिला सकते हैं। यदि नहीं मिला और वे निर्दलीय लड़े तो पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगने का खतरा है। उनकी कहानी साधारण पहाड़ी युवक से राजनीतिक ‘जिताऊ चेहरा’ बनने की नहीं है यह उत्तराखंड की हिमालयी राजनीति की परिपक्व समझ, स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ और वफादारी के दुर्लभ उदाहरण की कहानी है।
कुलदीप सिंह रावत का जन्म रुद्रप्रयाग जिले के एक साधारण पहाड़ी परिवार में हुआ। परिवार कृषि और छोटे-मोटे व्यापार पर निर्भर था। बचपन के दिन खेतों में काम, पशु चराना, लकड़ी काटना और स्कूल की पढ़ाई साथ-साथ चले। लेकिन पहाड़ ने जो शिक्षा दी, वह किताबों से कहीं ज्यादा मूल्यवान थी – संघर्ष, धैर्य और समुदाय की सेवा।
18-20 साल की उम्र में उन्होंने व्यापार की दुनिया में कदम रखा। शुरूआत छोटे किराने के स्टोर से हुई, फिर ट्रांसपोर्ट, निर्माण कार्य और केदारनाथ यात्रा मार्ग पर होटल-दुकानों का विस्तार। आज उनकी कुल संपत्ति 3.25 करोड़ रुपये से अधिक है (2022 के हलफनामे के अनुसार: चल संपत्ति लगभग 71.80 लाख, अचल 2.5 करोड़)। कोई आपराधिक मामले नहीं। जो दिखता है कि वह किस प्रकार व्यवसाय के द्वारा सामाजिक हितों से जुड़े हैं।लेकिन उनकी व्यापारिक सफलता का मंत्र अनोखा है – “तेरा तुझको अर्पण है”। यानी भगवान केदार की कृपा से जो कमाया, उसे जनता और मातृभूमि की सेवा में लौटा दो। यह दर्शन उन्हें साधारण व्यापारी से अलग करता है। उन्होंने स्थानीय युवाओं को नौकरियां दीं, महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर (सिलाई मशीन, छोटे उद्योग), कारीगरों को निर्माण कार्य में भागीदारी। केदारनाथ घाटी में यात्रा मार्ग पर छोटे-छोटे होटल और ट्रांसपोर्ट सुविधाएं उनके प्रयासों से चलीं। कमाई का बड़ा हिस्सा स्कूलों में किताबें, अस्पतालों में दवाएं और आपदा राहत में लगाया।
राजनीतिक रूप से देखें तो यह दृष्टिकोण उन्हें ‘सत्ता-लोलुप’ नेता से अलग रखता है। उत्तराखंड में जहां बड़े नेता अक्सर दिल्ली या देहरादून से फैसले थोपते हैं, कुलदीप रावत गांव-गांव घूमते हैं। यह जमीनी जुड़ाव ही उनकी राजनीतिक ताकत का आधार है।
कुलदीप सिंह रावत की असली पहचान राजनीति से पहले समाजसेवा है। वे बार-बार कहते हैं – “सुख-दुख में जनता के साथ खड़ा होना मेरा कर्तव्य है।” 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद से लेकर 2020-21 के कोरोना महामारी तक, उन्होंने इस वचन को निभाया।
कोरोना काल सबसे चुनौतीपूर्ण था। चारधाम यात्रा बंद, पर्यटक शून्य, स्थानीय दुकानदार-होटल मालिक बेरोजगार, ऑक्सीजन और दवाओं की कमी। जबकि बड़े नेता वीडियो मैसेज दे रहे थे, कुलदीप रावत राहत सामग्री लेकर केदारनाथ पहुंचे। घर-घर जाकर बुजुर्गों को दवाएं दीं, युवाओं को मास्क-सैनिटाइजर बांटे, गरीब परिवारों को राशन किट पहुंचाए। संक्रमित मरीजों के लिए ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और एम्बुलेंस की व्यवस्था की। कई परिवारों ने बताया कि “भाई साहब ने जान बचाई।”
उन्होंने युवाओं को घर बैठे ऑनलाइन व्यापार की ट्रेनिंग दी, सैनिटाइजेशन के तरीके सिखाए। यह सेवा सिर्फ संकट तक सीमित नहीं। बाढ़-भूस्खलन में पहले पहुंचना, स्कूल बच्चों को स्कॉलरशिप, महिलाओं को सिलाई मशीनें, किसानों को बीज-खाद – उनके सामाजिक कार्यों की सूची लंबी है। उनके समर्थक उन्हें “प्रसिद्ध समाजसेवी” कहते हैं।
राजनीतिक परिपक्वता से देखें तो यह सेवा उन्हें ‘जनता का अपना भाई’ बनाती है। उत्तराखंड में जहां आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा मुद्दा रहते हैं, कुलदीप का रिकॉर्ड उन्हें अन्य नेताओं से अलग करता है। वे दिल्ली की लहर या पार्टी के झंडे पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत संपर्क और सेवा पर निर्भर हैं। यही कारण है कि निर्दलीय लड़ते हुए भी वे इतने मजबूत रहे।
2017 का चुनाव इतिहास रचने के करीब।
2017 उत्तराखंड विधानसभा चुनाव। केदारनाथ सीट पर कांग्रेस के मनोज रावत ने 13,906 वोट (25.06%) से जीत हासिल की। लेकिन असली कहानी कुलदीप सिंह रावत की थी। निर्दलीय के रूप में उन्होंने 13,037 वोट (23.49%) प्राप्त किए – महज 869 वोटों से हार। भाजपा की शैला रानी रावत (जो बाद में पार्टी बदलकर भाजपा में आईं) तीसरे स्थान पर रहीं।
यह चुनाव केदारनाथ की राजनीति का टर्निंग पॉइंट था। एक नेक दिल व्यापारी ने बड़े दलों को नींद हराम कर दी। कुलदीप ने मुद्दे उठाए – बेहतर सड़कें, पर्यटन का स्थानीय लाभ, युवा रोजगार, महिला सशक्तिकरण। घर-घर जनसंपर्क किया। युवा और महिलाएं उनके साथ खड़ी हुईं।
राजनीतिक विश्लेषण: 2017 में कांग्रेस की लहर थी, फिर भी कुलदीप ने 23%+ वोट शेयर किया। यह साबित करता था कि केदारनाथ में ‘व्यक्ति’ वोट पाता है, पार्टी का झंडा नहीं। पहाड़ी राजनीति में जहां जाति और स्थानीय प्रभाव महत्वपूर्ण हैं, कुलदीप की जड़ें गहरी थीं। हार को उन्होंने सीढ़ी बनाया – अगले पांच साल सेवा कार्य तेज किए।
2022 में भाजपा की भारी लहर थी। शैला रानी रावत ने 21,886 वोट (36.04%) से जीत दर्ज की। लेकिन कुलदीप सिंह रावत निर्दलीय से 13,423 वोट (22.11%) लेकर दूसरे स्थान पर रहे – कांग्रेस के मनोज रावत (12,557 वोट) से आगे। अंतर 8,463 वोट।
यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं। पूरे राज्य में भाजपा की लहर के बावजूद एक स्वतंत्र उम्मीदवार ने 22% वोट बटोरे। विश्लेषक कहते हैं कि कुलदीप का वोट बैंक युवा, महिलाएं और किसान हैं। उन्होंने चुनाव में चारधाम यात्रा प्रबंधन, पहाड़ी महिलाओं का सशक्तिकरण, स्थानीय रोजगार और आपदा प्रतिरोधक विकास पर फोकस किया।
आज 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में कुलदीप रावत का नाम फिर चर्चा में है। यदि उन्हें टिकट मिला तो वे भाजपा को मजबूत जीत दिला सकते हैं। यदि नहीं मिला और वे निर्दलीय लड़े तो पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगने का खतरा है। उनकी कहानी साधारण पहाड़ी युवक से राजनीतिक ‘जिताऊ चेहरा’ बनने की नहीं है यह उत्तराखंड की हिमालयी राजनीति की परिपक्व समझ, स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ और वफादारी के दुर्लभ उदाहरण की कहानी है।
2022 में कुलदीप ने साबित किया कि उनकी लोकप्रियता किसी भी राष्ट्रीय लहर से ऊपर है। केदारनाथ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जहां पर्यटन और धार्मिक पर्यावरण संतुलन महत्वपूर्ण है, उनका विजन स्थानीय-केंद्रित था। “केदारनाथ को विश्व स्तर का पर्यटन स्थल बनाऊंगा, लेकिन स्थानीय लोगों का हित पहले” – उनका यह स्टैंड आज भी प्रासंगिक है।
शैला रानी रावत के निधन के बाद 2024 का उपचुनाव केदारनाथ की राजनीति का सबसे रोचक अध्याय बना। कुलदीप सिंह रावत ने भाजपा से टिकट की मांग की। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात की और स्पष्ट कहा – “मैं 35 हजार वोटों से जीत सकता हूं।” उनके 13 हजार+ कट्टर समर्थक हर हाल में तैयार थे।लेकिन पार्टी ने आशा नौटियाल को टिकट दिया। भाजपा के सम्मान के लिए कुलदीप ने चुनाव नहीं लड़ा। धामी और संगठन के अनुरोध पर पीछे हट गए, अपने समर्थकों को भाजपा के पक्ष में मोड़ा। नतीजा? आशा नौटियाल ने कांग्रेस के मनोज रावत को हराकर सीट बरकरार रखी।
यह समर्पण राजनीति में दुर्लभ है। एक नेता जो जानता था कि जीत हाथ में है, फिर भी पार्टी अनुशासन और सम्मान को निजी लाभ से ऊपर रखा। उत्तराखंड राजनीति में जहां उम्मीदवार बदलाव और बगावत आम है, कुलदीप का यह कदम वफादारी का मजबूत संदेश था। स्थानीय लोग कहते हैं – “कुलदीप रावत ने पार्टी के लिए अपनी जीत कुर्बान कर दी।”
2027 कुलदीप पर बढ़ता जनता का विश्वास।
अब 2027 के चुनाव की हलचल शुरू हो चुकी है। कुलदीप रावत के समर्थक गांव-गांव जनसंपर्क कर रहे हैं। यहां दो परिदृश्य हैं, दोनों राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।टिकट मिलने पर: कुलदीप भाजपा को मजबूत जीत दिला सकते हैं। उनकी जमीनी पकड़, 13 हजार+ वोट बैंक, सेवा रिकॉर्ड और “तेरा तुझको अर्पण है” का ईमानदार इमेज युवा-महिला वोटरों को आकर्षित करेगा। केदारनाथ में भाजपा की जीत पक्की हो सकती है। हाई कमान को यह फायदे का सौदा साबित हो सकता है।
टिकट न मिलने पर यदि वे निर्दलीय लड़े तो भाजपा को नुकसान हो सकता है। उनके कट्टर समर्थक वोट भाजपा से कटेंगे, सीट पर त्रिकोणीय लड़ाई में खतरा बढ़ेगा। विश्लेषक मानते हैं कि कुलदीप पार्टी के लिए ‘जिताऊ चेहरा’ हैं – उनकी बादशाहत ऐसी कि बिना उन्हें शामिल किए समीकरण अधूरा रहता है।
राजनीतिक परिपक्वता से देखें तो उत्तराखंड में स्वतंत्र प्रभावशाली चेहरे (जैसे पूर्व में कुछ अन्य क्षेत्रों में) पार्टी को मजबूत बनाते हैं। कुलदीप का विजन स्पष्ट है – सड़क-बिजली-पानी, युवा रोजगार रोकना, महिला सशक्तिकरण, पर्यटन में स्थानीय हिस्सेदारी। वे कहते हैं, “पहाड़ के बेटे सिर्फ राजनीति नहीं करते – यहां की मिट्टी की सेवा करते हैं।”
भाजपा के लिए हिंदुत्व का एपीसेंटर होने के कारण यह सीट कितनी महत्वपूर्ण है इस बात का लगाया जा सकता है कि जब भी केदारनाथ में चुनाव होते हैं हाई कमान इन नजरे भाजपा की इस सीट पर लगी रहती है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ के प्रति अपना समर्पण एवं अपना प्रेम व्यक्त कर चुके हैं।
2019 में चुनाव के बीच उन्होंने केदारनाथ के पास पवित्र गुफा में ध्यान किया, गेरुआ वस्त्र पहने और शिव भक्ति का अनुपम उदाहरण पेश किया। 2017 में आपदा के बाद उन्होंने 500 करोड़ की परियोजनाओं की नींव रखी। स्वच्छ केदारनाथ अभियान, चारधाम ऑल वेदर रोड, आदिगुरु शंकराचार्य समाधि स्थल का जीर्णोद्धार, मंदिर परिसर का सौंदर्यीकरण—ये सब मोदी जी के संकल्प के फल हैं। आज लाखों श्रद्धालु आसानी से पहुंच रहे हैं। केदारनाथ में रोपवे, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और पर्यटन बुनियादी ढांचा मोदी युग की देन है।
कुलदीप रावत एक समाज सेवी होने के साथ एक कुशल व्यवसाय भी हैं परंतु विधायक नहीं बनने के बावजूद उनके पास केदारनाथ के विकास का अच्छा रोड मैप है।
केदारनाथ के मुद्दे और कुलदीप का विजन
चारधाम यात्रा प्रबंधन (भीड़, सुरक्षा, पर्यावरण)
युवा प्रवास रोकना,आपदा प्रतिरोधक बुनियादी ढांचा,महिलाओं और किसानों की आय बढ़ाना,स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं कुलदीप का प्रस्तावित विजन इन सभी को छूता है। उनकी सेवा का रिकॉर्ड साबित करता है कि वे केवल वादे नहीं, अमल भी करते हैं।
कुलदीप सिंह रावत की कहानी प्रेरणा और राजनीतिक परिपक्वता दोनों है। पहाड़ के छोटे गांव से निकले व्यापारी से समाजसेवी और जिताऊ चेहरा तक का सफर एक संघर्ष की कहानी व्यक्त करता है।कोरोना और आपदा में सेवा, निर्दलीय की ताकत, 2024 में पार्टी के लिए समर्पण – सब कुछ उनकी बड़ी सोच दर्शाता है। निर्दलीय होकर कुलदीप रावत जब भी चुनाव लड़े उन्होंने अपना दम खम दिखाया और कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा प्रत्याशी को उन्होंने पीछे छोड़ा 2017 का चुनाव हो या 2022 का दोनों चुनाव में प्रचंड मोदी लहर के बावजूद उन्होंने अपना दम कम दिखाई और प्रत्येक चुनाव में उनका वोट बढ़ता गया यह निश्चित है कि कुलदीप रावत किसी भी पार्टी के लिए प्राथमिकता में रहेंगे क्योंकि उनके पास अपना जनाधार है उन्होंने समय-समय पर राष्ट्रीय पार्टियों के कैडर वोट को पीछे छोड़ दिखाया कि उनके पास उनका व्यक्तिगत कैडर वोट है जो लगभग 2022 में 13 हजार था और अब बढ़कर लगभग 20हजार बताया जा रहा है।
2027 में भाजपा को फैसला करना है – वफादारी का दोतरफा सम्मान केदारनाथ विधानसभा का रुख बदल सकते हैं। जनता का फैसला अंतिम होगा, लेकिन उनकी बादशाहत पहले से साफ है पार्टी का एक सही निर्णय भाजपा को बड़ा सियासी फायदा दे सकता है।
