डॉ अजय मोहन सेमवाल
विधायक खजान दास को लंबे अरसे के बाद दोबारा कैबिनेट मंत्री पद और गोपनीयता की शपथ यह महज एक औपचारिक समारोह नहीं बल्कि यह भाजपा के प्रति उनकी निष्ठा, बूथ स्तर से शुरू हुए जमीनी संघर्ष और कभी न डिगने वाली वफादारी का सच्चा पुरस्कार है।
उत्तराखंड की राजनीति में जब भी जमीनी संघर्ष, निष्ठा, सरलता और अटूट वफादारी की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है खजान दास का। 20 मार्च 2026 को पुष्कर सिंह धामी सरकार के कैबिनेट विस्तार में राजपुर रोड (आरक्षित) विधानसभा क्षेत्र के विधायक खजान दास ने कैबिनेट मंत्री पद की शपथ ली। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने लोक भवन में उन्हें सामाजिक कल्याण, अल्पसंख्यक कल्याण, छात्र कल्याण और भाषा विभाग की जिम्मेदारी सौंपी। यह उनकी दूसरी बार कैबिनेट मंत्री बनने की उपलब्धि है।
खजान दास की यह नियुक्ति महज एक पदोन्नति या चुनावी रणनीति नहीं है – बल्कि भाजपा के प्रति उनकी अटूट वफादारी का जीवंत प्रतीक है। बूथ स्तर के कार्यकर्ता से लेकर कैबिनेट मंत्री तक का सफर उन्होंने बिना किसी सियासी चालबाजी, परिवारवाद या सत्ता के लालच के तय किया। पार्टी ने उन्हें हर संकट में साथ पाया, हर चुनौती में मजबूत पाया और हर अवसर पर उनका विश्वास किया। 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह नियुक्ति भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा है जो दलित-वंचित वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है, लेकिन खजान दास के लिए यह पद पार्टी की वफादारी का सम्मान है – वह सम्मान जो बूथ कार्यकर्ता की मेहनत और निष्ठा को मिलता है।
खजान दास भाजपा के अनुसूचित जाति (दलित) वर्ग के सबसे बड़े और भरोसेमंद चेहरों में शुमार हैं। सरल स्वभाव, खुलकर मुद्दे उठाने की हिम्मत और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद उन्हें पार्टी का ‘संकट मोचन’ बनाता है। दलित चेहरा होने के बावजूद वे सर्वसमाज के नेता के रूप में स्थापित हैं। इस विस्तृत कवर स्टोरी में हम उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा, भाजपा संगठन में दिए गए हर पद, पार्टी के लिए उनके अथक योगदान, चुनावी संघर्ष, पहली मंत्री पद की उपलब्धियां, अंतरिम काल की सेवा और धामी सरकार में वापसी की अंदरूनी कहानी को विस्तार से समझेंगे।
खजान दास का जन्म 16 जून 1958 को हुआ। उनके पिता का नाम शांत दास (संता दास) था। परिवार साधारण सामाजिक-आर्थिक परिवेश से था। खजान दास ने मात्र कक्षा 8 तक ही औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। स्कूल छोड़ने के बाद वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गए। जन जागरूकता आंदोलन, शिक्षा सुधार और युवा मुद्दों पर उनकी सक्रियता ने उन्हें स्थानीय स्तर पर पहचान दिलाई।
1980 के दशक के अंत और 1990 के शुरुआती वर्षों में वे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े। उस दौर में भाजपा उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश का हिस्सा) में संगठन मजबूत करने की मुहिम चला रही थी। खजान दास ने बिना किसी बड़े पद की अपेक्षा किए, बूथ स्तर के कार्यकर्ता के रूप में काम शुरू किया। वे घर-घर जाकर पार्टी की सदस्यता बढ़ाते, स्थानीय समस्याओं को सुनते और कार्यकर्ताओं को प्रेरित करते। यह जमीनी संघर्ष ही बाद में उनका सबसे बड़ा पूंजी बना। परिवार की साधारण पृष्ठभूमि और शिक्षा की सीमितता के बावजूद उनकी मेहनत ने साबित किया कि राजनीति में निष्ठा और समर्पण ही सबसे बड़ा हथियार है।
खजान दास की राजनीतिक यात्रा में सबसे उल्लेखनीय उनका भाजपा संगठन में योगदान है। वे उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने बूथ कार्यकर्ता से शुरू करके प्रदेश स्तर के अहम पदों तक पहुंच बनाई – और हर पद पर पार्टी की वफादारी का प्रमाण दिया।
2000 में उन्हें भाजपा का जिला महासचिव बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने देहरादून जिले में पार्टी की सदस्यता अभियान चलाए, बूथ समितियों को सक्रिय किया, स्थानीय मुद्दों पर आंदोलन संगठित किए और कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास जगाया। 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में जब उत्तराखंड राज्य निर्माण की मांग जोरों पर थी, खजान दास ने पार्टी के आंदोलनकारी कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे पहाड़ी क्षेत्रों में जाकर कार्यकर्ताओं को जोड़ते, राज्य आंदोलन की भावना को मजबूत करते।
इसके बाद उन्हें क्रमशः भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष, महामंत्री और प्रवक्ता जैसे महत्वपूर्ण पद सौंपे गए। प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने पूरे राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग के बीच पार्टी का विस्तार किया। उन्होंने सैकड़ों दलित सम्मेलन आयोजित किए, जहां विकास, हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के एजेंडे को दलित-वंचित वर्ग तक पहुंचाया। महामंत्री के नाते संगठनात्मक बैठकों, प्रशिक्षण शिविरों, चुनावी रणनीति बनाने और बूथ मैनेजमेंट में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। प्रवक्ता के रूप में उनकी स्पष्टवादी छवि पूरे प्रदेश में चर्चित रही। वे मीडिया में पार्टी की लाइन को मजबूती से रखते थे, विपक्ष के हर हमले का जवाब देते थे और कभी भी पार्टी से समझौता नहीं किया।
वर्तमान में भी वे भाजपा उत्तराखंड के प्रदेश प्रवक्ता हैं। 2025 में भाजपा ने उन्हें नौ प्रवक्ताओं में शामिल किया था, जहां वे राजनीतिक मुद्दों पर पार्टी की मजबूत आवाज बनकर उभरे। उनकी यह भूमिका सिर्फ बोलने तक सीमित नहीं थी – उन्होंने पार्टी के आंतरिक असंतोष को शांत करने, क्षेत्रीय नेताओं को जोड़ने, चुनावी तैयारियों में सक्रिय रहकर और दलित कार्यकर्ताओं को मुख्यधारा से जोड़कर भाजपा को मजबूत किया।
पार्टी के लिए उनका सबसे बड़ा योगदान बूथ स्तर की मजबूती है। उन्होंने सैकड़ों बूथों पर कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया, स्थानीय समस्याओं को पार्टी नेतृत्व तक पहुंचाया और हर चुनाव में बूथ मैनेजमेंट का मॉडल तैयार किया। दलित समाज में भाजपा की पैठ बढ़ाने में खजान दास का नाम हमेशा लिया जाएगा। उन्होंने कभी जाति-आधारित राजनीति नहीं की, बल्कि विकास और हिंदुत्व के एजेंडे को दलित-वंचित वर्ग तक पहुंचाया। यही वजह है कि भाजपा उन्हें ‘संकट मोचन’ कहती है – संकट में वे शांत रहकर समाधान निकालते हैं, चाहे वह आंतरिक कलह हो या चुनावी चुनौती।
उनके कैबिनेट पद मिलना इसी वफादारी का प्रतीक है। पार्टी ने देखा कि खजान दास ने कभी सत्ता के लिए समझौता नहीं किया, कभी असंतोष नहीं जताया, बल्कि हर पद पर पार्टी को मजबूत किया। यही वजह है कि 2026 के विस्तार में उन्हें पहले नंबर पर चुना गया।
तीन बार विधायक, यह जीत जनता का विश्वास।
खजान दास की चुनावी यात्रा 2007 से शुरू हुई। भाजपा ने उन्हें पहाड़ी क्षेत्र की धनौल्टी विधानसभा सीट से टिकट दिया। वे पहली बार विधायक चुने गए। इस जीत ने न सिर्फ उनके राजनीतिक भविष्य को संवार दिया, बल्कि पार्टी को पहाड़ी क्षेत्र में मजबूत आधार दिया। उन्होंने क्षेत्र में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर काम किया।
2012 में धनौल्टी से हार के बाद उन्होंने देहरादून शिफ्ट किया। 2017 में राजपुर रोड (एससी) सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ा और कांग्रेस के राजकुमार को 8,632 वोटों के अंतर से हराकर दूसरी बार विधायक बने। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने इसी सीट पर शानदार प्रदर्शन किया। 37,027 वोट हासिल कर कांग्रेस के राजकुमार को 11,163 वोटों से हराया। तीन बार विधायक बनना ही उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
राजपुर रोड क्षेत्र में उन्होंने सड़क, पेयजल, सीवर, सफाई, अतिक्रमण, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर लगातार आवाज उठाई। विभागीय अधिकारियों से सीधे सवाल पूछना, क्षेत्र भ्रमण करना और जहां काम धीमा पड़ा, वहां सार्वजनिक रूप से आपत्ति दर्ज करना उनकी कार्यशैली रही। एक बार देहरादून स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की धीमी गति और राजपुर रोड सौंदर्यीकरण परियोजना में खर्च व गुणवत्ता पर उन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला – यह उनकी निडरता और जनता के प्रति वफादारी का उदाहरण है।
हर चुनाव में उन्होंने पार्टी के एजेंडे को जमीनी स्तर पर लागू किया। दलित वोटर्स के बीच भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाने में उनकी भूमिका निर्णायक रही।
कैबिनेट का पुराना अनुभव
2007 में धनौल्टी से जीत के बाद खजान दास को खंडूरी सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में रमेश पोखरियाल निशंक सरकार में उन्हें पूर्ण कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उन्हें खेल, शिक्षा, समाज कल्याण और आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए।
खेल मंत्री के रूप में उन्होंने दक्षिण एशियाई खेलों (SAF गेम्स) की तैयारी में अहम भूमिका निभाई। देहरादून और आउली में खेल सुविधाओं को मजबूत किया, खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया और ग्रामीण क्षेत्रों में खेल को बढ़ावा दिया। शिक्षा मंत्री के नाते स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं बढ़ाईं, छात्रवृत्ति योजनाओं को तेज किया, ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा पहुंच को प्राथमिकता दी और गुणवत्ता पर जोर दिया। समाज कल्याण विभाग में उन्होंने दलित-वंचित वर्गों के लिए पेंशन, आवास, स्वास्थ्य सुविधाएं और योजनाओं को प्रभावी बनाया।
आपदा प्रबंधन मंत्री के रूप में वे पहाड़ी क्षेत्रों की प्राकृतिक आपदाओं के समय सक्रिय रहे। 2010-11 के दौर में राज्य में आई आपदाओं के दौरान उन्होंने राहत कार्यों का नेतृत्व किया, विभागीय अधिकारियों को क्षेत्र भ्रमण पर भेजा और समस्याओं का तुरंत समाधान निकाला।
पहली मंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने पार्टी के लिए भी काम किया। भाजपा के दलित विंग को सक्रिय रखा, राज्य भर में अनुसूचित जाति सम्मेलन आयोजित किए और दलित कार्यकर्ताओं को मुख्यधारा से जोड़ा। उनकी कार्यशैली हमेशा पारदर्शी, जमीनी और निष्ठापूर्ण रही।
प्रवक्ता और जमीनी नेता के रूप में निरंतर पार्टी सेवा।
2012-2017 और 2022-2026 के बीच खजान दास ने मंत्री पद नहीं संभाला, लेकिन पार्टी संगठन में सक्रिय रहे। प्रदेश प्रवक्ता के रूप में उन्होंने हर चुनावी अभियान में पार्टी की लाइन सेट की। 2022 चुनाव में राजपुर रोड सीट पर उनकी रणनीति ने भाजपा को भारी मतों से जीत दिलाई।
उन्होंने अपनी ही सरकार के कुछ कामों पर सवाल उठाए – जैसे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की धीमी गति। यह उनकी ईमानदारी का प्रमाण था। पार्टी ने उन्हें कभी दंडित नहीं किया, बल्कि और ज्यादा जिम्मेदारी दी। इस दौरान वे बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं से जुड़े रहे, दलित वर्ग के मुद्दों को उठाया और पार्टी की वफादारी का उदाहरण पेश किया।
2026 कैबिनेट विस्तार धामी की रणनीति और खजान दास की वापसी।
2027 चुनाव से ठीक पहले धामी सरकार ने कैबिनेट का विस्तार किया। पांच नए मंत्रियों में खजान दास पहले नंबर पर थे। यह नियुक्ति भाजपा की दलित समीकरण रणनीति का हिस्सा है, लेकिन सबसे बड़ा संदेश यह है कि पार्टी वफादारी को पुरस्कृत करती है। खजान दास जैसे अनुभवी और जमीनी नेता को सामाजिक कल्याण, अल्पसंख्यक कल्याण, छात्र कल्याण और भाषा विभाग सौंपे गए हैं।
नए पद पर वे अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक योजनाओं को तेज करेंगे, छात्रों के लिए नई स्कॉलरशिप और कौशल विकास कार्यक्रम लाएंगे तथा राज्य की भाषा नीति को मजबूत करेंगे। उनकी नियुक्ति से भाजपा को उम्मीद है कि कांग्रेस की दलित वोट बैंक रणनीति को नुकसान पहुंचेगा। लेकिन खजान दास के लिए यह पद पार्टी की वफादारी का प्रतीक है – वह वफादारी जो बूथ से शुरू हुई और कैबिनेट तक पहुंची।
सरल स्वभाव सौम्य’और भाजपा के संकट मोचन
खजान दास की सबसे बड़ी पहचान उनकी सरलता है। कोई भी मुद्दा हो, उनकी सहजता और स्पष्टवादी शैली उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाती है। वे कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद रखते हैं, चाय की दुकान पर बैठकर समस्याएं सुनते हैं। दलित चेहरा होने के बावजूद वे सर्वसमाज के नेता हैं।
पार्टी में उन्हें ‘संकट मोचन’ कहा जाता है क्योंकि संकट के समय वे शांत रहकर रास्ता निकालते हैं। चाहे आंतरिक कलह हो या चुनावी हार का डर – उनकी सलाह हमेशा काम आई है। यही गुण उन्हें भाजपा का अमूल्य संपत्ति बनाते हैं।
खजान दास का संघर्ष बताता है कि भाजपा में निष्ठा, जमीनी काम और वफादारी का फल मिलता है। बूथ कार्यकर्ता से कैबिनेट मंत्री तक का सफर उन्होंने बिना किसी सियासी चालबाजी के तय किया। पार्टी ने उन्हें जिला महासचिव, प्रदेश उपाध्यक्ष, महामंत्री, प्रवक्ता, राज्य मंत्री और अब पूर्ण कैबिनेट मंत्री बनाया – हर पद पर उन्होंने पार्टी को मजबूत किया।
धामी सरकार में उनकी वापसी उत्तराखंड की राजनीति में सामाजिक समता, क्षेत्रीय संतुलन और वफादारी के सम्मान का संदेश देती है। आगे की राह में खजान दास से उम्मीद है कि वे नए विभागों में भी उसी निष्ठा, सरलता और जमीनी जुड़ाव से काम करेंगे।
उत्तराखंड की राजनीति में उनका यह सफर हर युवा कार्यकर्ता के लिए प्रेरणा है – मेहनत, निष्ठा, सरलता और पार्टी के प्रति अटूट वफादारी ही सच्ची सफलता का मंत्र है। भाजपा के लिए वे न सिर्फ दलित चेहरा हैं, बल्कि एक ऐसा संकट मोचन हैं जो हमेशा पार्टी और जनता के साथ खड़ा रहता है।
