Dr. Ajay Mohan Semwal
बहुमत और जीरो टॉलरेंस की परीक्षा।
उत्तराखंड में सत्ता पक्ष के विधायक बहुमत के मीठे दर्द से ग्रसित हैं और यह ऐसा दर्द है जिसे ना बताया जाता है और ना छुपाया जाता पर्याप्त बहुमत होने के कारण पार्टी में गुटबाजी के चेहरे चारों खाने नजर आ रहे हैं क्योंकि उनकी स्थिति कुछ इस प्रकार है की जाए तो जाएं कहां भाजपा में जरूरत नहीं और कांग्रेस के लिए वे जरूरी नहीं।
उत्तराखंड की राजनीति में स्थिरता और अस्थिरता के बीच का संतुलन हमेशा आसान नहीं रहा है पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार ने बहुमत की सरकार बनाकर एक बार फिर जनता का विश्वास जीतने का काम किया परंतु इस विश्वास के साथ ही जनता बार-बार सड़कों पर उतरकर सरकार को आईना दिखाने का कार्य बखूबी करने लगी। कुल मिलाकर लोकतंत्र की एक शानदार तस्वीर दिखाई दी। बहुमत की सरकार में गुटबाजी के चेहरों ने भी सरकार को अस्थिर कर नरम विपक्ष की भूमिका बहन करने में में इन चेहरों ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
विधायक अरविंद पांडे से जुड़े अतिक्रमण विवाद ने पार्टी के भीतर असंतोष की गहराई को उजागर किया है। यह मामला महज एक विधायक की व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि वरिष्ठ नेताओं की साइडलाइन होने की भावना, महत्वाकांक्षा के टकराव और ‘जूनियर कप्तान’ की तेज छवि से उपजे तनाव का प्रतीक बन गया है। पार्टी का केंद्रीय अनुशासन और उच्च कमान का मजबूत समर्थन अभी स्थिति को नियंत्रित रख पाया है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले यदि यह असंतोष अनसुलझा रहा तो सियासी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
पांडे पर आरोप लगे तो उन्होंने संन्यास की धमकी देते हुए उन्होंने कहा कि कई विधायकों का ‘गुप्त समर्थन’ उनके साथ है। इससे पहले जनवरी में उनके भाई देवानंद पांडे सहित चार लोगों पर धोखाधड़ी और धमकी का मामला दर्ज हुआ, जिसे भी उन्होंने प्रतिशोध करार दिया और सीबीआई जांच की मांग की।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, अनिल बलूनी, मदन कौशिक और बिशन सिंह चुफाल जैसे वरिष्ठ नेता गदरपुर जाने वाले थे, लेकिन उच्च कमान के दबाव में योजना रद्द हो गई। फरवरी 2026 में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने अचानक पांडे के निवास पर मुलाकात की, जिसे डैमेज कंट्रोल माना जा रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 2025 में संसद में अवैध खनन और पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल उठाए थे, जिससे धामी सरकार की छवि प्रभावित हुई। बाद में उन्होंने ‘सब ठीक है’ का रुख अपनाया। मदन कौशिक, बिशन सिंह चुफाल जैसे नेता कैबिनेट या महत्वपूर्ण पदों से वंचित हैं। धामी कैबिनेट में कई पूर्व मंत्रियों को जगह नहीं मिली, जिससे आक्रोश बढ़ा। पार्टी में ‘जूनियर की कप्तानी’ में खेलने की असहजता साफ है। धामी की निर्णायक छवि और विकास कार्यों पर फोकस उन्हें मजबूत बनाता है, लेकिन वरिष्ठों को लगता है कि उनकी महत्वाकांक्षा दबाई जा रही है।
मार्च 2026 में अमित शाह की हरिद्वार यात्रा (गायत्री परिवार के शताब्दी वर्ष समारोह में) ने स्थिति मजबूत की। शाह ने धामी को ‘परम मित्र’ कहा, जो उच्च कमान के समर्थन का प्रतीक है। धामी ने तैयारियों का जायजा लिया और कहा कि यह कार्यक्रम राज्य के विकास को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करेगा। केंद्र का खुला समर्थन असंतोष दबाने में कारगर है। धामी जानते हैं कि उनका ‘रिपोर्ट कार्ड’ कार्यों से तय होगा।
भाजपा के पास इतना बहुमत है कि कुछ विधायक बगावत करें तो सरकार नहीं गिरेगी। लेकिन यही बहुमत विधायकों के लिए ‘मीठा दर्द’ है। कांग्रेस में विकल्प नहीं, भाजपा में जरूरत कम महसूस हो रही है। कई विधायक विकास कार्यों में सीमित भूमिका से असंतुष्ट हैं। पार्टी में गुटबाजी की परंपरा जारी है, लेकिन धामी के कार्यकाल में अनुशासन ने इसे दबाया है।
कुल मिलाकर, धामी सरकार स्थिर है, लेकिन ‘बर्तनों की टकराहट’ दिल्ली तक सुनाई दे रही है। उच्च कमान का समर्थन और कार्यों का रिपोर्ट कार्ड ही इसे शांत रख सकता है। 2027 तक यदि भाजपा एकजुट रही तो तीसरी बार सत्ता संभव है; अन्यथा इतिहास दोहराया जा सकता है। पार्टी को अब आंतरिक संवाद बढ़ाना होगा, ताकि बहुमत का लाभ सियासी मजबूती बने, न कि कमजोरी का कारण।
