डॉ अजय मोहन सेमवाल
826 स्कूलों पर ताले
उत्तराखंड में 826 प्राथमिक विद्यालयों पर ताले लगना चिंताजनक है आपको बता दें मैदाने की तुलना में पहाड़ों में अधिक स्कूल बंद हुए हैं जो पलायन के दर्द को बताता है शिक्षा स्वास्थ्य और रोजगार के लिए आज भी पलायन हो रहा है प्रश्न यही है कि पलायन कब तक।
उत्तराखंड में चहुमुखी विकास के बड़े-बड़े वादे तब फेल हो जाते हैं जब इस प्रकार के आंकड़े सामने आते हैं सरकारी व्यवस्थाएं धरी की धरी रह जाती है क्योंकि ग्राउंड लेवल पर योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए पलायन रोकने के लिए कोई भी स्पष्ट नीति नहीं बनी है सभी समस्याओं का आमूल चूल कारण पहाड़ों में पलायन ही जान पडता है पलायन के आगे सरकार नतमस्तक नजर आती है आज भी पहाड़ में पहाड़ जैसी समस्याएं सरकार का मुंह ताक रही हैं की कब आप एक अच्छा रोड मैप बनाकर पहाड़ को मैदान के समकक्ष खड़ा करेंगे।
उत्तराखंड के शिक्षा क्षेत्र में हाल ही में सामने आया एक चौंकाने वाला आंकड़ा पूरे राज्य को सोचने पर मजबूर कर रहा है। विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों (2020 से 2025 तक) में राज्य के 826 प्राथमिक स्कूलों पर ताले लग चुके हैं। यह संख्या कोई राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग द्वारा विधानसभा में सौंपा गया आधिकारिक डेटा है। एक हालिया ग्राफ उत्तराखंड के मानचित्र पर जिला-वार ये आंकड़े दर्शाता है – टीहरी गढ़वाल में 262, पौड़ी गढ़वाल में 120, पिथौरागढ़ में 104, अल्मोड़ा में 83, नैनीताल में 49, चमोली में 43, चंपावत में 34, बागेश्वर में 25, उत्तरकाशी में 25, ऊधम सिंह नगर में 21, रुद्रप्रयाग में 15, देहरादून में 38 और हरिद्वार में मात्र 2 स्कूल बंद हुए हैं। कुल मिलाकर 826 प्राथमिक विद्यालय छात्र-विहीन होकर बंद कर दिए गए।
यह ग्राफ सिर्फ संख्या नहीं दिखाता, बल्कि पहाड़ी उत्तराखंड की सिसकती हकीकत को उजागर करता है। मैदानी जिलों (हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर, देहरादून) में यह संख्या नगण्य है, जबकि गढ़वाल और कुमाऊं के पहाड़ी जिलों में यह आंकड़ा भयावह है।
यह स्थिति केवल स्कूल बंद होने की नहीं, बल्कि पलायन की उस भयंकर लहर की है जो उत्तराखंड के गांवों को सूना कर रही है।
पहाड़ी जिलों (उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टीहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा, चंपावत, नैनीताल) में कुल बंद स्कूलों की संख्या 700 से ऊपर है, जबकि मैदानी जिलों (देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर) में मात्र 61। टीहरी गढ़वाल में 262 स्कूल बंद होना सबसे चिंताजनक है।
यह जिला, जहां गांवों की संख्या अधिक है और कृषि-पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था है पौड़ी में 120 और पिथौरागढ़ में 104 स्कूल बंद होने से साफ है कि सीमांत और दुर्गम क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
ये आंकड़े प्राथमिक स्कूलों (क्लास 1-5) के हैं। राज्य में कुल लगभग 12,000 प्राथमिक स्कूल हैं, लेकिन 826 का बंद होना मात्र 5 साल में 7% से ज्यादा का नुकसान है। और चिंता की बात – शिक्षा विभाग के अनुसार 4,000 से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां छात्र संख्या 10 या उससे कम रह गई है। 2025 में एक भी नया सरकारी स्कूल नहीं खुला, जबकि बंदी का सिलसिला जारी है।
बंद स्कूलों के प्रमुख कारण- पलायन
सरकारी रिपोर्ट और मीडिया रिपोर्टों में एक ही वजह बार-बार दोहराई जा रही है – छात्र संख्या शून्य। लेकिन इस शून्यता की जड़ में क्या है? पलायन। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से पहाड़ी क्षेत्रों से युवाओं का पलायन तेज हुआ। 2011 की जनगणना और बाद के NSSO सर्वे के अनुसार, गढ़वाल-कुमाऊं के 30-40% युवा रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों या विदेशों में चले गए। 2025 तक यह आंकड़ा और बढ़ गया है।
रोजगार की कमी: पहाड़ों में कृषि पर निर्भरता, लेकिन छोटे-छोटे जोत, मौसम की मार (बाढ़, भूस्खलन), कम उत्पादकता। युवा सरकारी नौकरी या निजी क्षेत्र में जाते हैं। पर्यटन और होमस्टे की संभावना है, लेकिन बुनियादी सुविधाएं दम तोड़ रही है।
पलायन को अगर संख्या में समझें तो उत्तराखंड माइग्रेशन प्रिवेंशन की रिपोर्ट (2025) बताती है कि पहाड़ी जिलों के 3500+ गांवों में आबादी तेजी से घट रही है। कई गांव “घोस्ट विलेज” बन चुके हैं – जहां 10-20 बुजुर्ग रहते हैं। स्कूल बंद होने का सीधा संबंध इसी से है।यह पलायन सिर्फ आर्थिक नहीं, डेमोग्राफिक संकट भी पैदा कर रहा है। विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों (2020 से 2025 तक) में राज्य के 826 प्राथमिक स्कूलों पर ताले लग चुके हैं। यह संख्या कोई राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग द्वारा विधानसभा में सौंपा गया आधिकारिक डेटा है।यह स्थिति केवल स्कूल बंद होने की नहीं, बल्कि पलायन की उस भयंकर लहर की है जो उत्तराखंड के गांवों को सूना कर रही है। इस समीक्षा में हम इस मुद्दे को विस्तार से समझेंगे – आंकड़ों का विश्लेषण, बंदी के कारण, पलायन से इसका गहरा संबंध, सामाजिक-आर्थिक प्रभाव, सरकारी प्रयास और अंत में संभावित समाधान।
सरकारी रिपोर्ट और मीडिया रिपोर्टों में एक ही वजह बार-बार दोहराई जा रही है – छात्र संख्या शून्य। लेकिन इस शून्यता की जड़ में क्या है? पलायन। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से पहाड़ी क्षेत्रों से युवाओं का पलायन तेज हुआ। 2011 की जनगणना और बाद के NSSO सर्वे के अनुसार, गढ़वाल-कुमाऊं के 30-40% युवा रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों या विदेशों में चले गए। कुल मिलाकर पहाड़ी राज्य में विकास का सही रोड मैप तक नहीं आएगा तब तक बुनियादी व्यवस्थाओं को संघर्ष करना पड़ेगा।
