डॉ अजय मोहन सेमवाल/देहरादून
2027 के चुनावी समीकरण बदलेगा SIR
Intro.. उत्तराखंड में चुनाव आयोग का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अब चुनावी जंग की पहली पारी बन चुका है। 83 लाख से घटकर 71 लाख रह गई मतदाता सूची, 12 लाख नामों की कटौती और 19 लाख नोटिसों ने भाजपा-कांग्रेस दोनों को अलर्ट कर दिया है। यह सफाई 2027 मे किसके लिए खतरे की घंटी साबित होगी।
उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों मतदाता सूची के इर्द-गिर्द घूम रही है। चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) ने राज्य की चुनावी जंग को समय से पहले ही तेज कर दिया है। 2022 विधानसभा चुनाव के समय राज्य में 83 लाख से अधिक मतदाता दर्ज थे। प्री-SIR और SIR प्रक्रिया के बाद ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल में यह संख्या घटकर लगभग 71.33 लाख रह गई है। करीब 12 लाख नाम हट चुके हैं, जबकि लगभग 19 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड में विसंगतियां पाई गई हैं और उन्हें नोटिस जारी किए गए हैं।
यह प्रक्रिया 1 जुलाई 2026 को अर्हता तिथि मानकर चलाई गई। गणना पत्रों का वितरण और डिजिटाइजेशन जून-जुलाई में पूरा हुआ। ड्राफ्ट रोल 14 जुलाई को प्रकाशित हुआ और दावे-आपत्तियों की अवधि 13 अगस्त तक चली। अंतिम सूची सितंबर 2026 में आने वाली है। मुख्य कारण स्थायी पलायन, मृत्यु, अनुपस्थिति और डुप्लिकेट नाम बताए गए हैं। पहाड़ी जिलों की तुलना में मैदानी जिलों—खासकर देहरादून, ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार—में कटौती का प्रतिशत काफी ऊंचा रहा।
SIR से पहले राज्य में लगभग 79.60 लाख मतदाता थे। गणना पत्र वापस न लौटने वाले (Uncollectable Enumeration Forms – UEF) करीब 8.41 लाख (10.56 प्रतिशत) रहे। इनमें से लगभग 4.80 लाख स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके थे। देहरादून में सबसे ज्यादा असर दिखा—कुल 13.76 लाख मतदाताओं में से करीब 1.91 लाख (13.86 प्रतिशत) UEF श्रेणी में आए। ऊधम सिंह नगर में भी 13 प्रतिशत से अधिक नाम प्रभावित हुए। पहाड़ी जिलों में यह प्रतिशत काफी कम रहा क्योंकि वहां आबादी अपेक्षाकृत स्थिर है।प्री-SIR चरण में ही 4.5 लाख से अधिक ASD (Absent, Shifted, Dead) मतदाताओं के नाम हटाए जा चुके थे। कुल मिलाकर मतदाता संख्या 83 लाख से घटकर 71 लाख के आसपास आ गई। दिलचस्प बात यह है कि मतदाताओं की संख्या घटने के बावजूद मतदान केंद्रों की संख्या 11,733 से बढ़कर 12,543 हो गई—यानी करीब 810 नए बूथ जुड़े। यह बदलाव प्रशासनिक रूप से मतदान प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए किया गया है।19 लाख से अधिक मतदाताओं को “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” या अन्य विसंगतियों के कारण नोटिस मिले। इनमें नाम की वर्तनी में अंतर, उम्र का माता-पिता से मेल न खाना, पुराने रिकॉर्ड से असंगति जैसी समस्याएं शामिल हैं। यहां तक कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी और कुछ पूर्व आईएएस अधिकारियों को भी नोटिस मिले, जो प्रक्रिया की व्यापकता को दर्शाता है।
मीडिया रिपोर्ट्स और उपलब्ध आंकड़ों से यह स्पष्ट नहीं होता कि कटने वाले नामों में भाजपा और कांग्रेस के समर्थकों का सटीक अनुपात क्या है। चुनाव आयोग किसी भी पार्टी के आधार पर डेटा जारी नहीं करता। फिर भी, भौगोलिक पैटर्न और 2022 के नतीजों के आधार पर कुछ अनुमान लगाए जा सकते हैं।
मैदानी क्षेत्रों—देहरादून, ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार—में कटौती सबसे ज्यादा हुई। ये क्षेत्र शहरीकरण, आर्थिक गतिविधि और बाहरी राज्यों (खासकर उत्तर प्रदेश) से आने वाले लोगों की बसावट से प्रभावित हैं। यहां दोनों पार्टियों की उपस्थिति मजबूत है। अमर उजाला जैसी रिपोर्टों के अनुसार, जिन 10 विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा मतदाता खतरे में थे, उनमें सात भाजपा की (काशीपुर, धर्मपुर, ऋषिकेश, रायपुर, रुद्रपुर, सहसपुर, डोईवाला) और तीन कांग्रेस की (बाजपुर, किच्छा, हल्द्वानी) थीं।
कांग्रेस का आरोप है कि फॉर्म-7 के जरिए उनके समर्थकों के नाम काटने की कोशिश हो रही है और आपत्तियों की बाढ़ से वास्तविक मतदाताओं को बाहर किया जा सकता है। पार्टी का कहना है कि बड़े पैमाने पर नोटिस और आपत्तियां कांग्रेस वोट बैंक को निशाना बना रही हैं। भाजपा इसे खारिज करती है और कहती है कि प्रक्रिया निष्पक्ष है, गलत या मृत/शिफ्टेड नाम ही हट रहे हैं। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस चुनाव से पहले ही हार मान चुकी है और आरोप लगाकर अपनी कमजोरी छिपा रही है।
बूथ लेवल एजेंट (BLA) की नियुक्ति में शुरुआती चरण में कांग्रेस कुछ सीटों पर आगे रही, लेकिन बाद के आंकड़ों में भाजपा ने कुल बूथों पर मजबूत उपस्थिति दर्ज की। दोनों पार्टियां अपने BLA को सक्रिय करके अपने समर्थकों के नाम बचाने और नए नाम जुड़वाने में जुटी हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में जहां कटौती कम है, वहां पारंपरिक वोट बैंक अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकते हैं। मैदानी सीटों पर, जहां मार्जिन अक्सर कम होते हैं, प्रभाव ज्यादा पड़ सकता है।
उत्तर प्रदेश में SIR के विश्लेषण से पता चला था कि भाजपा के गढ़ों में कटौती का प्रतिशत कुछ क्षेत्रों में ऊंचा रहा। उत्तराखंड में ऐसा स्पष्ट पैटर्न सामने नहीं आया है, लेकिन मैदानी क्षेत्रों की ऊंची कटौती दोनों पार्टियों को प्रभावित कर सकती है। पलायन की वजह से पहाड़ से मैदान की ओर गए मतदाताओं के नाम कटने से पहाड़ी सीटों का वोट बैंक प्रभावित हो सकता है, जबकि मैदान में नई बसावट वाले मतदाता अगर सही तरीके से जुड़ते हैं तो समीकरण बदल सकते हैं।
उत्तराखंड में 70 विधानसभा सीटें हैं। 2022 के चुनाव में कई सीटों पर जीत का अंतर हजार वोट से भी कम था। लोहाघाट में मात्र 40 वोट और लालकुआं में 175 वोट जैसे मार्जिन याद किए जा सकते हैं। ऐसे में कुछ सौ या हजार वोटों का बदलाव परिणाम प्रभावित कर सकता है। राजनीतिक विश्लेषक एसएमए काजमी जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि 2002 के बाद यह सबसे बड़ा गहन पुनरीक्षण है। व्यापक राजनीतिक प्रभाव अभी बताना जल्दबाजी होगी, लेकिन बूथ स्तर पर लड़ाई निर्णायक साबित हो सकती है।SIR के बाद मतदाता सूची ज्यादा सटीक और अद्यतन हो जाएगी। मृत, शिफ्टेड और डुप्लिकेट नाम हटने से “फर्जी” या निष्क्रिय वोटों की संभावना कम होगी। इससे चुनाव अधिक साफ-सुथरे हो सकते हैं। लेकिन दावे-आपत्तियों के चरण में दोनों पार्टियों की सक्रियता यह तय करेगी कि अंतिम सूची में कितने नाम वापस जुड़ते हैं या कितने और कटते हैं।
जनसांख्यिकीय बदलाव भी महत्वपूर्ण है। पहाड़ों से पलायन और मैदानों में बाहरी बसावट राज्य की वोटिंग पैटर्न को लंबे समय से प्रभावित कर रही है। SIR इस प्रक्रिया को और स्पष्ट कर रही है। अगर स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके मतदाताओं के नाम कटते हैं और नए योग्य मतदाता जुड़ते हैं, तो कई सीटों पर जाति, शहरी-ग्रामीण और क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं।
कांग्रेस संगठन को सक्रिय कर रही है—जिला स्तर पर निगरानी समितियां बना रही है और कार्यकर्ताओं को निर्देश दे रही है कि पात्र मतदाताओं के नाम बचाने में मदद करें। भाजपा भी बूथ प्रबंधन और लाभार्थी संपर्क पर जोर दे रही है। दोनों पार्टियां जानती हैं कि 2027 में वोट बैंक की लड़ाई SIR के नतीजों से शुरू हो चुकी है।
SIR उत्तराखंड की मतदाता सूची को 20 साल बाद बड़े पैमाने पर अपडेट कर रहा है। करीब 12 लाख नाम हटने और 19 लाख के स्कैनर पर होने से सूची साफ हो रही है, लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों को नुकसान और फायदा दोनों हो सकते हैं—यह निर्भर करेगा कि अंतिम सूची में कौन कितने समर्थकों के नाम बचा पाता है और नए मतदाताओं को कितना जोड़ पाता है।
2027 के चुनाव पर सीधा और निर्णायक प्रभाव पड़ेगा या नहीं, यह अभी कहना मुश्किल है। लेकिन करीबी मुकाबले वाली सीटों पर और मैदानी क्षेत्रों में प्रभाव पड़ने की पूरी संभावना है। चुनाव आयोग की प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के अनुसार चल रही है, लेकिन पार्टियों की बूथ स्तर की मेहनत ही अंतिम नतीजा तय करेगी। अंतिम मतदाता सूची आने के बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी। फिलहाल, SIR ने 2027 की चुनावी जंग की पहली पारी शुरू कर दी है—और यह पारी वोट बैंक की सफाई और संरक्षण की है।
