डॉ. अजय मोहन सेमवाल/देहरादून
उत्तराखंड में दोहरी पेंशन का बड़ा घोटाला उजागर हुआ है जहां सरकारी कर्मचारी भी पेंशन के साथ-साथ अन्य पेंशन वृद्धावस्था,विधवा पेंशनों का लाभ ले रहे हैं उत्तराखंड की मनी ऑर्डर अर्थव्यवस्था आज भी मनी ऑर्डर पर ही चल रही है और सरकारी खजाने राम नाम की लूट, लूट सके तो लूट हर कोई बेताब बैठा है
उत्तराखंड राज्य पर एक और कर्ज का बोझ बढ़ रहा है वहीं दूसरी ओर राज्य की जनता राज्य के प्रति कितनी ईमानदार है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिला है जहां राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट हर कोई अपनी तिजोरी भरने में लगा है।पारदर्शिता और जनकल्याण की योजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए, आज एक गंभीर वित्तीय अनियमितता के साए में खड़ा है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की हालिया डेटा विश्लेषण रिपोर्ट ने राज्य के 1377 पूर्व सरकारी कर्मचारियों द्वारा सरकारी पेंशन के साथ-साथ समाज कल्याण विभाग की वृद्धावस्था पेंशन (₹1500 प्रति माह) और कुछ मामलों में विधवा पेंशन का अनुचित लाभ उठाने का खुलासा किया है। यह मामला मात्र एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के प्रति लापरवाही और नैतिक पतन का स्पष्ट प्रमाण है।
CAG, जो भारत के संवैधानिक निकाय के रूप में सार्वजनिक व्यय की निगरानी करता है, ने सरकारी कर्मचारी पेंशन डेटाबेस और समाज कल्याण विभाग की सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं के डेटा का आधार नंबर आधारित क्रॉस-वेरिफिकेशन किया। यह डिजिटल क्रांति का एक सकारात्मक उदाहरण है, जहां आधार/यूआईडी के माध्यम से दोनों सूचियों में 1377 समान आधार नंबर मिले। इन पूर्व कर्मचारियों ने विभिन्न विभागों से रिटायरमेंट के बाद भी नियमों की अनदेखी कर दोहरी पेंशन प्राप्त की। नियम स्पष्ट हैं—सरकारी पेंशनधारक (या उनके जीवनसाथी) वृद्धावस्था, विधवा या अन्य समान योजनाओं के लिए अपात्र होते हैं, क्योंकि उनकी आय पहले से ही सुनिश्चित है। फिर भी, यह लूट पिछले कई वर्षों से चल रही थी।
वित्तीय नुकसान का आकलन करें तो प्रत्येक मामले में औसतन ₹1500 मासिक पेंशन पर 10-12 वर्षों का लाभ मानें, तो एक व्यक्ति पर ₹1.8 से ₹2.16 लाख का अनुचित भुगतान हुआ। कुल मिलाकर यह राशि ₹25 करोड़ से अधिक हो सकती है—यह आंकड़ा केवल वृद्धावस्था/विधवा पेंशन का है। कुछ मामलों में स्वतंत्रता सेनानी पेंशन या राज्य आंदोलनकारी पेंशन जैसी अन्य योजनाओं का भी दोहरा लाभ मिला है। यह राशि राज्य के बजट में स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां संसाधनों की पहले से कमी है।
समाज कल्याण विभाग ने CAG रिपोर्ट मिलने के बाद त्वरित कार्रवाई की। कुल 1377 मामलों में से 93 व्यक्तियों की मृत्यु हो चुकी थी, 314 मामलों में पहले ही पेंशन बंद हो चुकी थी या अन्य कारण थे। शेष 970+ मामलों (कुछ रिपोर्टों में ठीक 970 या 1000+) में सामाजिक सुरक्षा पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई है। अपात्र लाभार्थियों की सूची सभी 13 जिलाधिकारियों को भेजी गई है, जहां घर-घर जाकर या दस्तावेज सत्यापन से जांच होगी। विभाग ने शासन को विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें पिछले वर्षों की गलत राशि की ब्याज सहित वसूली और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की गई है। मुख्य सचिव और वित्त विभाग को CAG ने 15 दिनों में कार्रवाई रिपोर्ट मांगी थी, जो इस मामले की गंभीरता दर्शाती है।
यह घोटाला सिस्टम की कई कमजोरियों को उजागर करता है। सबसे प्रमुख है डेटाबेस का अभाव एकीकरण—पहले आधार-लिंक्ड क्रॉस-चेक अनिवार्य नहीं था। आवेदन फॉर्म में सरकारी पेंशन का उल्लेख छिपाना आसान रहा। स्थानीय स्तर पर सत्यापन ढीला था, और कई मामलों में उच्च पदों से रिटायर्ड लोग शामिल थे, जो जानबूझकर नियम तोड़ रहे थे। यह लालच, निरीक्षणहीनता और जवाबदेही की कमी का परिणाम है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है और सख्त कार्रवाई का संकेत दिया है। विपक्ष ने इसे “घपलेबाजों” पर हमला करने का मुद्दा बनाया है। जनता में आक्रोश स्वाभाविक है—क्योंकि ये योजनाएं उन वृद्धजनों, विधवाओं और असहायों के लिए हैं जो वास्तव में जरूरतमंद हैं। दोहरी पेंशन का यह दुरुपयोग उन असली लाभार्थियों से संसाधन छीनता है, जो बिना किसी सरकारी पेंशन के जीवन यापन कर रहे हैं।
यह मामला डिजिटल इंडिया और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) की सफलता भी साबित करता है। आधार-आधारित सत्यापन ने बड़े पैमाने पर लीकेज रोका है। सरकार अब सभी योजनाओं में ऐसे क्रॉस-चेक को अनिवार्य बनाने पर विचार कर रही है, जो सराहनीय है। लेकिन सवाल यह है—क्या यह कार्रवाई केवल दिखावटी होगी या वास्तविक सुधार लाएगी?
उत्तराखंड सरकार के सामने अब दो चुनौतियां हैं: पहली, तत्काल वसूली और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई; दूसरी, भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए मजबूत सिस्टम। सभी पेंशन योजनाओं का एकीकृत डेटाबेस, नियमित ऑडिट, सख्त सत्यापन प्रक्रिया और जन जागरूकता अभियान आवश्यक हैं। सरकारी खजाना जनता का है—इसकी रक्षा हर अधिकारी, कर्मचारी और नागरिक का कर्तव्य है।
“राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट”—यह पुरानी कहावत आज उत्तराखंड में फिर से गूंज रही है। लेकिन अब समय आ गया है कि हम इसे उलट दें। पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता से ही देवभूमि की साख बनी रहेगी। CAG जैसी संस्थाएं लोकतंत्र की रक्षा करती हैं—अब सरकार को इनकी सिफारिशों पर अमल करके साबित करना होगा कि जनता का विश्वास टूटा नहीं है।
कुल मिलाकर नैतिकता और राज्य के प्रति अपनी मौलिक जिम्मेदारियां नागरिक किस प्रकार ईमानदारी से निभा रहे हैं इसका बड़ा जीता जागता उदाहरण देखने को मिल रहा है जहां विधायकों की पेंशन को लेकर सवाल खड़े किए जाते हैं परंतु वही जनता जब राज्य के खजाने को लूटने के लिए बेताब दिखती है स्थितियां कुछ इस प्रकार जान पड़ती है कि भ्रष्ट जनता का भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट सिस्टम मैं राम नाम की लूट लूट सके तो लूट।
