डॉ. अजय मोहन सेमवाल
गुटबाजी के चेहरे फिर ढेर।
डैमेज कंट्रोल के बहाने शक्ति प्रदर्शन।
गुटबाजी के बाउंसर पर धामी का सिक्सर।

उत्तराखंड में गुटबाजी के चेहरे एक बार फिर सरकार के लिए सरदर्द बने हुए हैं गृहमंत्री अमित शाह ने खुले मंच से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को परममित्र बताकर गुटबाजी के चेहरों की बची कुची कसर पर पानी फेर दिया, राजनीति में संजीवनी तलाश रहा असंतुष्ट कुनबा अब इस स्थिति में आन पड़ा है कि साहब जाए तो जाएं कहा? भाजपा में जरूरत नहीं और कांग्रेस की मजबूरी नहीं।
उत्तराखंड में भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के खिलाफ चल रही गुटबाजी एक सुनियोजित और गहन षड्यंत्र का रूप ले चुकी है। यह गुटबाजी केवल व्यक्तिगत असंतोष या छोटी-मोटी असहमति नहीं है, बल्कि पार्टी के कुछ प्रभावशाली असंतुष्ट नेताओं द्वारा मुख्यमंत्री की छवि को कमजोर करने, उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाने और अंततः हाईकमान पर दबाव बनाकर उनके स्थानांतरण या कमजोर करने की रणनीति है। यह षड्यंत्र मुख्य रूप से गदरपुर विधायक अरविंद पांडे को मोहरा बनाकर चलाया जा रहा है, जबकि इसके पीछे पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद अनिल बलूनी, पूर्व विधायक मदन कौशिक और अन्य जैसे बिशन सिंह चुफाल आदि नेताओं की सक्रियता भी जान पड़ती है।
हाल के घटनाक्रमों, जैसे अरविंद पांडे पर अतिक्रमण नोटिस, गदरपुर दौरा रद्द होना, पेपर लीक मामले में त्रिवेंद्र रावत की भूमिका और सोशल मीडिया/मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। यह देखने को मिला है कि कैसे यह गुटबाजी पार्टी की अनुशासित छवि को चुनौती दे रही है, लेकिन हाईकमान की मजबूत पकड़ के कारण अभी तक कंट्रोल में है। उत्तराखंड पहुंचे गृहमंत्री अमित शाह ने खुले मंच से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जनपरक योजनाओं की तारीफ करते हुए उन्हें अपना परम मित्र बताया, असंतुष्ट और गुटबाजी के चेहरों को ये शब्द शब्द भेदी बाण की भांति चुभे, गुटबाजी के चेहरों की बची कुची कसर पर पानी फिरता नजर आया।
धामी का उदय और असंतुष्टों की जलन।
पुष्कर सिंह धामी 2021 में उत्तराखंड के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। उनकी नियुक्ति हाईकमान की पसंद थी, जो तीरथ सिंह रावत के इस्तीफे के बाद हुई। 2022 विधानसभा चुनाव में धामी खुद खटीमा सीट से हार गए, लेकिन पार्टी ने उन्हें फिर मुख्यमंत्री बनाया। यह फैसला असंतुष्ट गुट के लिए सबसे बड़ा झटका था, क्योंकि कई वरिष्ठ नेता खुद को मुख्यमंत्री पद का हकदार मानते थे। जूनियर कैंडिडेट को मुख्यमंत्री बनाना इन्हें रास नहीं आया और आरोप तो यहां तक लगे कि वरिष्ठ मंडली के कुछ विधायकों ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को हराने में भीतर घात का काम भी किया, जिसकी भनक हाईकमान को लग गई और हाई कमान ने इन चेहरों से दूरियां बनाना शुरू कर दिया जिस कारण इनके अंदर आक्रोश और अधिक पनप गया, अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पूरी न होते देख बार-बार वरिष्ठ मंडली के विधायक दिल्ली दरबार में हाजिरी लगाकर आए परंतु हर बार खाली हाथ ही लौटना पड़ा।
सर दर्द बने त्रिवेंद्र
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत वे अब हरिद्वार से सांसद हैं, लेकिन राज्य की राजनीति में प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं। समय-समय पर त्रिवेंद्र रावत ने भी पार्टी मैं रहते हुए नरम विपक्ष की भूमिका निभाई है सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने में त्रिवेंद्र पीछे नहीं रहे। uksssc भर्ती घोटाले में बेरोजगार युवाओं के द्वारा लंबा आंदोलन किया गया और सरकार से सीबीआई जांच की मांग की गई जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जनहित में सीबीआई को मंजूरी दी परंतु पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान हरिद्वार सांसद इसमें भी श्रेय लेने की होड़ में लग रहे और कार्यकर्ताओं ने हरिद्वार सांसद का ऐसा स्वागत किया मानो सीबीआई जांच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने नहीं बल्कि हरिद्वार सांसद की संस्तुति पर हुई हो, राजनीति के जानकारों ने इस घटना को कुछ इस प्रकार वर्णन किया मानो तुम कौन में खामखा।
लोकसभा में अपनी सरकार को घेरा।
त्रिवेंद्र उत्तराखंड में तो सरकार की किरकिरी करने में लग रहे परंतु उन्होंने वह नारा सार्थक कर दिया कि सड़क से संसद तक अपनी सरकार को कोसते रहेंगे,त्रिवेंद्र सिंह रावत ने लोगसभा (Lok Sabha) में उत्तराखंड में रात्रि समय में अवैध खनन ट्रकों के संचालन और सरकार की अनदेखी को लेकर प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अवैध रूप से भारी भरे ट्रक रात में चलते हैं, जो सड़क, पुल, पर्यावरण और आम जनता की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं, और आरोप लगाया कि राज्य प्रशासन इस पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रहा है। त्रिवेंद्र के इस बयान के बाद उत्तराखंड में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र की किरकिरी शुरू हो गई और इस बयान के बाद त्रिवेंद्र अकेले नजर आए।
ब्यूरोक्रेसी से विवाद।
हरिद्वार के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत दलित आइएएस अधिकारी और राज्य के खनन सचिव ब्रजेश संत के खिलाफ अपनी टिप्पणी को लेकर विवादों में घिरे यह तब हुआ जब हरिद्वार से भाजपा सांसद रावत ने हाल ही में संसद में उत्तराखंड में अवैध खनन का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और उधम सिंह नगर जिलों में रात में अवैध खनन ट्रकों का संचालन किया जा रहा है। खनन सचिव बृजेश कुमार संत द्वारा आरोपों को ‘निराधार, झूठा और भ्रामक’ करार दिए जाने के बाद यह मुद्दा और तूल पकड़ गया और उन्होंने कहा कि इसका सबसे बड़ा सबूत उत्तराखंड के गठन के बाद चालू वित्तीय वर्ष में खनन राजस्व में अब तक की सबसे अधिक वृद्धि है। संत की प्रतिक्रिया के बारे में पूछे जाने पर रावत ने कथित तौर पर कहा, ‘क्या कहना है? शेर कुत्तों का शिकार नहीं करते।’ इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, राज्य की आइएएस एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि उसके सदस्यों के साथ उचित सम्मान के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए।
हर बार बैक फुट पर त्रिवेंद्र
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं हरिद्वार लोकसभा से सांसद त्रिवेंद्र रावत बार-बार अपनी ही सरकार को घेरने से नहीं चूकते परंतु हाई कमान के सख्त अनुशासन, के चलते त्रिवेंद्र को बार-बार बैक फुट पर आकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की तारीफ करनी पड़ी कुल मिलाकर त्रिवेंद्र का यह रथ यही नहीं रुक मन ही मन अभी भी त्रिवेंद्र कुंठित नजर आ रहे हैं।
सांसद अनिल बलूनी
उत्तराखंड की राजनीति को दिल्ली से अस्थिर करने का खेल कोई नया खेल नहीं है ऐसा पहले भी होता आया है चाहे सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की प्रदेश में मुखिया बनने की चाह दिल्ली में बैठे हुक्मरानों की रही है। सांसद अनिल बलूनी ने प्रत्यक्ष तौर पर इस इच्छा को जाहिर तो नहीं किया परंतु राजनीतिक पंडितों का कहना है कि प्रदेश में सरकार जितनी अस्थिर होगी इसका प्रत्यक्ष लाभ अनिल बलूनी को मिल सकता है, और उत्तराखंड का यह इतिहास ik है कि पार्टी ने जिसे भी सांसद बनाकर दिल्ली भेजा उसने उत्तराखंड की राजनीति को अस्थिर करके अपना उल्लू सीधा करने का काम बखूबी किया इसी प्रकार का घटना चक्र चलता रहा और आज भी जारी है।
गुटबाज़ी को हवा देने के आरोप।
उत्तराखंड की राजनीति पहले ही गुटबाज़ी से जूझती रही है। ऐसे में यदि किसी वरिष्ठ नेता के इर्द-गिर्द एक अलग खेमे की चर्चा होने लगे, तो अस्थिरता बढ़ना तय है। अनिल बलूनी पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे असंतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बनाए रखते हैं और इससे एक वैकल्पिक शक्ति संरचना का आभास मिलता है। भले ही इसे राजनीतिक संवाद कहा जाए, लेकिन इसका प्रभाव सरकार की एकजुटता पर पड़ता है। राजनीति के पंडितों का कहना है की अनिल बलूनी असंतुष्ट अति महत्वाकांक्षी विधायकों के कंधों पर बंदूक रखकर स्वयं के लिए निशाना साथ रहे हैं।
दिल्ली बनाम देहरादून की राजनीति
अनिल बलूनी की ताकत का एक बड़ा स्रोत उनका राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव और दिल्ली से निकटता मानी जाती है। उत्तराखंड की राजनीति में यह धारणा भी बनती रही है कि दिल्ली में बैठकर देहरादून की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिशें होती हैं। जब मुख्यमंत्री राज्य में निर्णय लेते हैं और संगठन या केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर अलग संकेत जाते हैं, तो यह द्वंद्व सरकार को कमजोर करता है। बलूनी की भूमिका को इसी संदर्भ में देखा जाता है।
मुख्यमंत्री धामी का नेतृत्व और चुनौती
पुष्कर सिंह धामी अपेक्षाकृत युवा और जमीनी नेता के रूप में उभरे हैं। उनके नेतृत्व में सरकार ने कई फैसले लिए हैं और एक स्थिर छवि बनाने की कोशिश की है। लेकिन भीतर से चुनौती मिलना किसी भी मुख्यमंत्री के लिए मुश्किल स्थिति पैदा करता है। यदि अनिल बलूनी की महत्वाकांक्षा और गतिविधियाँ धामी के नेतृत्व को लगातार प्रश्नों के घेरे में लाती हैं, तो यह न केवल व्यक्ति विशेष, बल्कि सरकार की स्थिरता के लिए भी चुनौती बन जाती है।राजनीतिक अस्थिरता का असर सिर्फ सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव प्रशासन, विकास योजनाओं और जनता के भरोसे पर भी पड़ता है। यदि नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, तो नौकरशाही से लेकर निवेशकों तक में असमंजस पैदा होता है। अनिल बलूनी की मुख्यमंत्री बनने की चाहत यदि इसी तरह परोक्ष रूप से राजनीतिक हलचल को बढ़ाती रही, तो इसका नुकसान अंततः राज्य को ही होगा।
गुटबाजी का रावण चेहरा एक सिर अनेक।
गुटबाजी की बात करें तो उत्तराखंड में गिरने और गिराने की सियासत लंबे समय से चलती रही है। वर्तमान में कुछ इसी प्रकार से अति महत्वाकांक्षा पाले पार्टी के शीर्ष वरिष्ठ नेताओं को अपना भविष्य डगमग दिखता है क्योंकि जूनियर की कप्तानी मैं खेलना उन्हें रास नहीं आ रहा है और जूनियर कप्तान उनकी सोच से एक कदम आगे निकलकर ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करके विरोधियों के छक्के छुड़ा रहा है।
भाजपा में मदन कौशिक, बिशन सिंह चुफाल अरविंद पांडे जैसे वरिष्ठ नेता वर्तमान में कैबिनेट या महत्वपूर्ण पदों से वंचित हैं, जिससे उनकी बौखलाहट साफ दिखती है। इसके अतिरिक्त पूर्व में दायित्वधारी रह चुके अनेक ऐसे चेहरे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी टीम में जगह नहीं दी जिसके कारण उनके अंदर भी आक्रोश पनप रहा है और अपना भविष्य अंधकार में देख मात्र विकल्प के तौर पर सफलता का रास्ता उन्हें विद्रोह ही दिख रहा है। असंतुष्ट कुनबे को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जनपरक योजनाएं यूसीसी, अवैध अतिक्रमण हटाना, अवैध खनन पर सख्ती) से रास नहीं आ रही है क्योंकि ये उनके स्थानीय प्रभाव और आर्थिक हितों को कमजोर करती हैं।
गदरपुर विधायक का गदर
गदरपुर विधायक अरविंद पांडे गुटबाजी के केंद्र में हैं पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे परंतु अब कैबिनेट से उनकी छुट्टी कर दी गई है और लंबे समय से सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे हैं, खासकर अवैध खनन पर। तहसील प्रशासन ने उनके गूलरभोज स्थित आवास पर सरकारी भूमि अतिक्रमण के लिए नोटिस जारी किया। 15 दिनों में कब्जा हटाने को कहा गया, अन्यथा ध्वस्त करने की चेतावनी दी गई। पांडे ने इसे व्यक्तिगत हमला माना और इशारों-इशारों में धामी सरकार की आलोचना शुरू की। उन्होंने मीडिया में कहा कि यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई है। इससे पूर्व भी विधायक अरविंद पांडे ने सरकार को घेरने में कोई कसक नहीं छोड़ी परंतु सख्त अनुशासन के चलते उन्हें बार-बार बैक फुट पर आना पड़ा अब सवाल यह है कि पांडे जी भली भांति जानते हैं कि बहुमत की सरकार है दो-चार विधायकों की नाराजगी का सरकार पर तो कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिख रहा है इसके विपरीत यह नाराजगी 2027 में इन विधायकों पर भारी पड़ सकती है।
भीतर घात के गंभीर आरोप।
उत्तराखंड की राजनीति में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया जब मेयर दीपक बाली ने वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व मंत्री अरविंद पांडे पर गंभीर आरोप लगाए। मेयर बाली का दावा है कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को हराने के पीछे अरविंद पांडे की कथित भूमिका रही, जिससे पार्टी और सरकार दोनों को नुकसान पहुँचा।
दीपक बाली के अनुसार, उस समय पार्टी के भीतर कुछ ऐसे तत्व सक्रिय थे जो आधिकारिक प्रत्याशी के पक्ष में पूरी निष्ठा से काम करने के बजाय भीतरघात में लगे रहे। बाली ने सीधे तौर पर अरविंद पांडे का नाम लेते हुए कहा कि खटीमा सीट पर मुख्यमंत्री धामी की हार केवल विपक्ष की वजह से नहीं हुई, बल्कि संगठन के भीतर से मिले कमजोर समर्थन और कथित विरोध ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई।
मेयर बाली का कहना है कि यदि पार्टी के वरिष्ठ नेता एकजुट होकर मुख्यमंत्री के लिए काम करते, तो परिणाम अलग हो सकता था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान जमीनी कार्यकर्ताओं को भ्रमित किया गया और चुनावी रणनीति को जानबूझकर कमजोर किया गया। बाली के अनुसार, यह केवल एक व्यक्ति को हराने का प्रयास नहीं था, बल्कि नेतृत्व को कमजोर करने की सोची-समझी राजनीतिक चाल थी।
इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। क्योंकि पुष्कर सिंह धामी न केवल मुख्यमंत्री हैं, बल्कि भाजपा का एक उभरता चेहरा भी माने जाते हैं, ऐसे में उनके चुनावी नुकसान को लेकर पार्टी के भीतर आरोप-प्रत्यारोप गंभीर संकेत देते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान भाजपा के अंदर चल रही गुटबाज़ी को सार्वजनिक मंच पर ले आया है।फिलहाल, यह स्पष्ट है कि मेयर दीपक बाली के बयान ने उत्तराखंड की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है—क्या मुख्यमंत्री धामी की चुनावी हार सिर्फ जनादेश थी, या इसके पीछे पार्टी के भीतर की राजनीति ने भी भूमिका निभाई? इसका जवाब आने वाले दिनों में पार्टी की प्रतिक्रियाओं और नेतृत्व के रुख से ही सामने आ पाएगा।
डैमेज कंट्रोल के बहाने शक्ति प्रदर्शन
भाजपा विधायक अरविंद पांडे को संकट में देखकर त्रिवेंद्र रावत, अनिल बलूनी और मदन कौशिक गदरपुर जाने वाले थे, ताकि उन्हें “पावरफुल” बनाया जा सके और समर्थन जुटाया जा सके। सभी अरविंद पांडे के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना साधना चाहते थे भाजपा हाईकमान ने हस्तक्षेप किया और दौरा रद्द करवा दिया। इससे पांडे अब अकेले नजर आ रहे हैं, क्योंकि कोई खुलकर साथ नहीं दे रहा। अब अरविंद पांडे के खिलाफ ही पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने बिगुल फूंक दिया है अरविंद पांड का हौसला बढाने वाला कुनबा मूकदर्शक बना है।
यह घटना चक्र कुछ इसी प्रकार रहा कि चूहो की मीटिंग में सेनापति को लेकर बड़ा निर्णय लिया गया, सेनापति का हौसला बढाकर सेनापति चूहे के गले में घंटी बांधकर साथी चूहे अपने सेनापति को बिल्ली के दरवाजे पर छोड़कर भाग खड़े हुए।यह घटना स्पष्ट करती है कि षड्यंत्र सुनियोजित था – पांडे को मोहरा बनाकर धामी की घेराबंदी करना उद्देश्य था परंतु हाईकमान का हस्तक्षेप दिखाता है कि पार्टी अभी भी नियंत्रण में है।
प्रेशर पॉलिटिक्स बेनकाब।
क्योंकि 2027 में टिकट का बंटवारा रिपोर्ट कार्ड देखकर ही होना है कि किस प्रकार सरकार के खिलाफ बगावत की गई और पूर्व में बगावत करने वाले कुछ वरिष्ठ विधायक आज राजनीति की हाशिये पर हैं।जिनकी भूमिका नरम विपक्ष की है – खुले विद्रोह नहीं, लेकिन लगातार सवाल उठाकर धामी की छवि कमजोर करना। अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हुई तो अपनी ही सरकार को टारगेट किया, लेकिन बाद में बैकफुट पर आकर कहा, “सरकार अच्छा काम कर रही है, मुख्यमंत्री के नेतृत्व में जन-आकांक्षाएं पूरी हो रही हैं।” दबाव बनाने की यह रणनीति लंबे समय से चल रही है परंतु लेकिन हाईकमान के सख्त अनुशासन के चलते हर बार जग हसाई हुई।
असंतुष्टों का कुनबा और रणनीति।
अरविंद पांडे के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए शक्ति प्रदर्शन के तौर पर सांसद अनिल बलूनी पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत, बिशन सिंह चोखल एवं मदन कौशिक के नाम सामने आए, बताया गया कि डैमेज कंट्रोल के लिए भाजपा के नेता अरविंद पांडे से मिलना चाहते थे परंतु राजनीति के विश्लेषकों का कहना है कि यह डैमेज कंट्रोल नहीं बल्कि डैमेज कंट्रोल के बहाने गुटबाजी का खुला शक्ति प्रदर्शन था और बहुमत की सरकार को एक चुनौती पेश करने का बहाना था जिसमें असंतुष्ट कुनबे को सफलता हाथ ना लगी। इसी शीर्ष कड़ी में बार-बार सरकार को घेरने में कुछ पूर्वदायित्वधारी भी पीछे नहीं रहे बताया गया कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इन दायित्व अधिकारियों को दूसरी बार अपनी टीम में जगह नहीं दी जिस कारण इनके अंदर पनप रहा आक्रोश समय-समय पर दिखाई दिया, दर्जाधारियो का यह असंतुष्ट कुनबा भी अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली और विश्वसनीयता पर सवाल उठाते नजर आया। विपक्ष और नरम विपक्ष भली भांति जानता है कि भाजपा के पास उत्तराखंड में पर्याप्त बहुमत (47 सीटें) है। दो-चार नाराज विधायक सरकार गिरा नहीं सकते। ऐसे में यह नाराजगी असंतुष्ट कुनबे का रिपोर्ट कार्ड खराब कर सकती है जिसका खामियाज 2027 में इन्हें भुगतना पड़ सकता है। मुख्यमंत्री धामी जानते हैं कि हाईकमान उनका मूल्यांकन जनकल्याणकारी कार्यों (यूसीसी, पेपर लीक कार्रवाई, अवैध निर्माण हटाना) से करेगा। इसलिए वे सिर्फ काम करने पर फोकस करते हैं रूठना और मनाने की गणित उनकी कार्यशैली में नहीं है। भाजपा सरकार में ऐतिहासिक फैसला मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार के द्वारा लिए गए और उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री एन डी तिवारी को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया परंतु अब पुष्कर सिंह धामी इस रिकॉर्ड के साथ-साथ उत्तराखंड में अब सबसे लंबे कार्यकाल के मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड तोड़ने के लगभग करीब है जो उन्हें अग्रिम पंक्ति में खड़ा करता है, असंतुष्ट मंडली को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के धाकड़ फैसले, और विश्व स्तर पर युवा मुख्यमंत्री की उभरती हुई छवि रास नहीं आ रही है, इसलिए समय-समय पर यह असंतुष्ट मंडली किसी बहाने बहुमत की सरकार को आंख दिखाने का प्रयास तो करती है परंतु उतनी ही जल्दी बैक फुट पर आकर धामी को अच्छा कप्तान बताकर बाँस इज ऑलवेज राइट की सूक्ति को चरितार्थ करते नजर आती है। कुल मिलाकर हर बार असंतुष्ट मंडली के बाउंसर पर मुख्यमंत्री धामी का सिक्सर उनकी मजबूत बल्लेबाजी और मजबूत कप्तानी को दर्शाता है।
भारी पड़ सकता है षड्यंत्र
यह गुटबाजी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का परिणाम है, जो पार्टी को अस्थिर करने की कोशिश है। लेकिन हाईकमान की मजबूत पकड़ और धामी की सकारात्मक छवि से यह अभी खानापूर्ति तक सीमित है। यदि असंतुष्ट नेता जारी रहे, तो 2027 चुनावों में पार्टी ही नहीं वरन इस असंतुष्ट मंडली को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। मुख्यमंत्री धामी की जनकल्याणकारी रिपोर्ट कार्ड ही उनका सबसे बड़ा हथियार है। पुष्कर सिंह धामी भलीभांति जानते हैं कि भाजपा में आपका रिपोर्ट कार्ड ही आपका भविष्य तय करता है, और केंद्र के साथ उनकी अच्छी बॉन्डिंग दिखती है कि 2027 विधानसभा चुनाव भी उनके नेतृत्व में लड़ा जाएगा धाकड़ मुख्यमंत्री सिर्फ कार्य करने में विश्वास रखते हैं ढिंढोरा पीटने में नहीं और समय के साथ-साथ उनके हिंदुत्व के पोस्टर बॉय की छवि ने उन्हें विश्व स्तर पर पहचान दी है।
