डॉ .अजय मोहन सेमवाल
उत्तराखंड में कॉन्ग्रेस का कुनबा धीरे-धीरे बढ रहा है तीन पूर्व विधायकों की जॉइनिंग से कांग्रेस में खुशी तो भाजपा में गम की लहर दिखाई देती है, हालांकि भाजपा इनको रिजेक्ट कर चुकी है परंतु इन्हीं रिजेक्ट चेहरों पर कांग्रेस गेम खेल कर 2027 की फतह करना चाहती है।
उत्तराखंड में 2027 विधानसभा का चुनावी बिगुल बज चुका है अक्सर शांत दिखाई देने वाली पहाड़ी राज्य में सियासी उथल-पुथल का दौर जारी है।राज्य एक ऐसे ही दौर से गुजर रहा है, जहां सतह पर सब कुछ सामान्य दिखते हुए भी सत्ता के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। यह बदलाव किसी एक घटना का परिणाम नहीं है, बल्कि कई समानांतर प्रक्रियाओं का संगम है—मतदाता सूची में संभावित कटौती, दल-बदल की बढ़ती घटनाएं, संगठनात्मक असंतोष, और जनता के बीच धीरे-धीरे आकार लेता असंतोष चुनाव में प्रभाव दिखा सकता है।
देहरादून से लेकर दिल्ली तक, कांग्रेस के नेताओं के हालिया बयानों में आत्मविश्वास झलकता है। पार्टी के प्रदेश नेतृत्व का दावा है कि लगातार नए लोग कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं और यह केवल संयोग नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक बदलाव का संकेत है। यह बदलाव केवल संख्या का नहीं, बल्कि मनोविज्ञान का भी है—एक ऐसी पार्टी जो कुछ वर्षों पहले हाशिये पर दिख रही थी, वह अब खुद को मुख्य मुकाबले में देखने लगी है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के बयान इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं। उनका कहना है कि जैसे-जैसे कांग्रेस का कुनबा बढ़ रहा है, भाजपा के भीतर बेचैनी भी बढ़ती जा रही है। यह आरोप केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है—कि भाजपा की नीतियों और कार्यशैली से उसके अपने लोग भी संतुष्ट नहीं हैं। यही वजह है कि कई नेता और कार्यकर्ता अब विकल्प तलाश रहे हैं।
दूसरी ओर, प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा का बयान कांग्रेस के भीतर के मनोबल को और मजबूत करता है। उन्होंने बजट सत्र के दौरान कांग्रेस के प्रदर्शन की सराहना करते हुए यह स्पष्ट किया कि पार्टी केवल विरोध की राजनीति नहीं कर रही, बल्कि जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठा रही है। यह रुख कांग्रेस को एक जिम्मेदार विपक्ष के रूप में स्थापित करने में मदद करता है—जो लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह उभार अचानक नहीं है। इसके पीछे कई कारण हैं—महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर जनता की नाराजगी, और भाजपा सरकार के खिलाफ बढ़ता असंतोष। जब जनता के बीच असंतोष होता है, तो उसका सीधा असर राजनीतिक दलों पर पड़ता है। कांग्रेस इस असंतोष को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रही है।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही दिलचस्प है। भाजपा के भीतर भी कुछ ऐसी आवाजें उठ रही हैं जो इस बात का संकेत देती हैं कि सब कुछ ठीक नहीं है। भाजपा से जुड़े कुछ नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने के बाद दिए गए बयान यह दर्शाते हैं कि पार्टी के भीतर टिकट वितरण, नेतृत्व शैली और कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष मौजूद है।
राजकुमार ठुकराल जैसे नेताओं का खुलकर बोलना इस बात का संकेत है कि भाजपा के भीतर संवाद की कमी है। उनका यह कहना कि भाजपा का नाम लेते ही वे भड़क उठते हैं, केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि एक व्यापक असंतोष का प्रतीक भी हो सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पार्टी ने उन्हें उपयोग करने के बाद किनारे कर दिया। यह आरोप यदि व्यापक स्तर पर सही साबित होता है, तो भाजपा के लिए यह एक गंभीर चुनौती बन सकता है।
राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह लगातार और एक दिशा में होने लगे, तो इसके पीछे के कारणों को समझना जरूरी हो जाता है। कांग्रेस में शामिल हो रहे नेताओं की संख्या और उनकी पृष्ठभूमि यह दर्शाती है कि यह केवल अवसरवाद नहीं, बल्कि एक रणनीतिक बदलाव भी हो सकता है।
संजय नेगी जैसे नेताओं का यह कहना कि पार्टी में उनके शामिल होने को लेकर विरोध हो रहा है, यह भी दर्शाता है कि कांग्रेस के भीतर भी चुनौतियां हैं। एक तरफ जहां पार्टी का विस्तार हो रहा है, वहीं दूसरी ओर आंतरिक संतुलन बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह जरूरी होता है कि वह नए और पुराने कार्यकर्ताओं के बीच संतुलन बनाए रखे, अन्यथा यह विस्तार ही विवाद का कारण बन सकता है।
कांग्रेस के सामने यह अवसर है कि वह अपने संगठन को मजबूत करे और एक स्पष्ट वैकल्पिक एजेंडा पेश करे। केवल भाजपा के खिलाफ बोलना पर्याप्त नहीं होगा—उसे यह भी दिखाना होगा कि वह सत्ता में आने पर क्या अलग करेगी। जनता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होती, उसे ठोस योजनाएं और उनका क्रियान्वयन चाहिए।
भाजपा के लिए यह समय आत्ममंथन का है। लंबे समय से सत्ता में रहने के बाद अक्सर दलों में आत्मसंतोष आ जाता है। लेकिन राजनीति में स्थायित्व का कोई नियम नहीं होता। यदि जनता का विश्वास डगमगाता है, तो सबसे मजबूत सरकार भी कमजोर पड़ सकती है। भाजपा को यह समझना होगा कि केवल संगठनात्मक ताकत और नेतृत्व का करिश्मा ही पर्याप्त नहीं है—जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की संतुष्टि और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करना भी उतना ही जरूरी है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, वहां राजनीतिक दलों को अधिक संवेदनशील होना पड़ता है। पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा जैसे मुद्दे यहां की राजनीति के केंद्र में हैं। यदि कोई दल इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाता है और समाधान प्रस्तुत करता है, तो उसे जनता का समर्थन मिल सकता है।
कांग्रेस का यह दावा कि 2027 में वह सत्ता में वापसी करेगी, फिलहाल एक राजनीतिक लक्ष्य है। लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उसे लंबा रास्ता तय करना होगा। संगठन को मजबूत करना, नेतृत्व में स्पष्टता लाना और जनता के बीच भरोसा कायम करना—ये सभी कदम आवश्यक हैं।
भाजपा के लिए भी यह एक चेतावनी है। यदि वह इस चुनौती को गंभीरता से नहीं लेती, तो आने वाले चुनावों में उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि भाजपा की संगठनात्मक क्षमता और संसाधन उसे अभी भी मजबूत स्थिति में रखते हैं, लेकिन राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं।
अंततः, यह पूरा घटनाक्रम लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत भी है। जब विपक्ष मजबूत होता है, तो सरकार भी अधिक जवाबदेह बनती है। कांग्रेस का उभार और भाजपा की चुनौती—दोनों मिलकर एक स्वस्थ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का निर्माण कर सकते हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में यह दौर परिवर्तन का है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह बदलाव स्थायी है या केवल क्षणिक। लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस का बढ़ता कुनबा और भाजपा के भीतर बढ़ती टेंशन—दोनों ही आने वाले चुनावों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
राजनीति में कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती। आज जो मजबूत है, वह कल कमजोर हो सकता है, और जो आज संघर्ष कर रहा है, वह कल सत्ता में आ सकता है। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है—और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी।इसलिए, यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तराखंड की सियासत एक नए मोड़ पर खड़ी है। कांग्रेस अपने विस्तार के साथ नई उम्मीदें जगा रही है, वहीं भाजपा को अपने भीतर झांकने की जरूरत है। आने वाले वर्षों में यह टकराव और तेज होगा—और इसका फैसला अंततः जनता के हाथ में ही होगा।
जब कोई नेता यह कहता है कि पार्टी ने उसे “उपयोग के बाद किनारे कर दिया,” तो यह उस व्यापक भावना को दर्शाता है जो कई कार्यकर्ताओं के भीतर हो सकती है। यह भावना अगर बढ़ती है, तो इसका सीधा असर चुनावी मशीनरी पर पड़ता है—कार्यकर्ता निष्क्रिय हो जाते हैं, और संगठन की ताकत कमजोर पड़ती है।
मतदाता सूची में कटौती-साइलेंट गेमचेंजर।
इस पूरी राजनीतिक तस्वीर में एक और महत्वपूर्ण तत्व जुड़ता है—मतदाता सूची का शुद्धिकरण। अगर राज्य में 6 से 7 प्रतिशत तक मतदाता कम हो जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि एक साइलेंट गेमचेंजर साबित हो सकता है।
लगभग 5 से 6 लाख वोटों का कम होना किसी भी चुनाव का परिणाम बदल सकता है। यह कटौती किन वर्गों को प्रभावित करेगी, यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
पलायन कर चुके पहाड़ी मतदाता, जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस के समर्थक माने जाते हैं, अधिक प्रभावित हो सकते हैं।शहरी और मोबाइल वोटर्स, जो भाजपा की ओर झुकाव रखते हैं, भी कुछ हद तक प्रभावित होंगे लेकिन कुल मिलाकर, यह कटौती कांग्रेस के लिए अपेक्षाकृत अधिक नुकसानदायक हो सकती थी। इसके बावजूद, मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस इस नुकसान की भरपाई नए जुड़ रहे नेताओं और एंटी-इन्कम्बेंसी के जरिए कर सकती है।
वोट बैंक का गणित
अगर हम पूरे घटनाक्रम को चुनावी आंकड़ों में बदलकर देखें, तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है।कांग्रेस को जहां नए जुड़ाव और असंतोष का फायदा मिल सकता है, वहीं भाजपा को संगठनात्मक असंतुलन का नुकसान उठाना पड़ सकता है।अनुमान के अनुसार:कांग्रेस को कुल वोट शेयर में 2.5% से 4% तक का फायदा मिल सकता है।भाजपा को 2% से 3.5% तक का नुकसान हो सकता हैयहां सबसे महत्वपूर्ण बात “नेट स्विंग” की है, जो लगभग 4% से 6% तक जा सकता है।उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां कई सीटें 2–3% के अंतर से तय होती हैं, यह स्विंग बेहद निर्णायक हो सकता है। इसका मतलब है कि 10 से 18 विधानसभा सीटों का परिणाम प्रभावित हो सकता है।
कुल मिलाकर प्रदेश में सियासी ऊंट किस करवट बदलेगा यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, कांग्रेस में पूर्व विधायकों की जॉइनिंग बीजेपी के लिए टेंशन का बड़ा कारण बन सकती है यदि इसी प्रकार कांग्रेस का कुनबा बढ़ता गया तो भाजपा के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
