डॉ .अजय मोहन सेमवाल /देहरादून
संगठन से सत्ता तक: सुनील उनियाल ‘गामा’ की राजनीतिक यात्रा और मसूरी की नई दस्तक।
देहरादून की नगर राजनीति से निकलकर उत्तराखंड की मुख्यधारा की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाले सुनील उनियाल ‘गामा’ आज भाजपा के उन चुनिंदा नेताओं में गिने जाते हैं, जिनके पास संगठन का लंबा अनुभव, जनसंघर्ष की विरासत और प्रशासनिक नेतृत्व का रिकॉर्ड मौजूद है। पूर्व मेयर के रूप में मिली व्यापक पहचान के बाद अब मसूरी विधानसभा की राजनीति में उनकी बढ़ती सक्रियता ने उन्हें संभावित दावेदारों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है।
उत्तराखंड की राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनका प्रभाव केवल चुनावी मंचों या पदों तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनका पूरा राजनीतिक जीवन संगठन, संघर्ष और जनसंपर्क की लंबी यात्रा का परिणाम होता है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और देहरादून के पूर्व मेयर सुनील उनियाल ‘गामा’ ऐसे ही नेताओं में गिने जाते हैं। पिछले तीन दशकों से अधिक समय से सक्रिय राजनीति में मौजूद गामा आज एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। कारण है मसूरी विधानसभा सीट, जहां भाजपा के संभावित दावेदारों में उनका नाम लगातार प्रमुखता से उभर रहा है।
उत्तराखंड के राजनीतिक परिदृश्य में सुनील उनियाल गामा की पहचान केवल एक पूर्व मेयर की नहीं है। वे उन नेताओं में हैं जिन्होंने संगठन के सबसे निचले पायदान से अपनी यात्रा शुरू की और धीरे-धीरे भाजपा के भरोसेमंद चेहरों में शामिल हुए। 8 अक्टूबर 1962 को जन्मे गामा का राजनीतिक जीवन उस दौर में शुरू हुआ जब उत्तराखंड अलग राज्य नहीं था और पहाड़ों की राजनीति नए स्वरूप की तलाश में थी।
वर्ष 1989 में वार्ड अध्यक्ष के रूप में राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले गामा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1991 में वे भाजपा युवा मोर्चा के नगर महामंत्री बने। इसके बाद 1993 में पुनः उन्हें यही जिम्मेदारी सौंपी गई। उस समय भाजपा उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में अपने संगठन का विस्तार कर रही थी और गामा जैसे कार्यकर्ता पार्टी की जमीनी ताकत को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।
वर्ष 1995 में वे भाजपा नगर अध्यक्ष बने और 1997 में जिला अध्यक्ष के रूप में उनकी जिम्मेदारियां और बढ़ीं। राज्य गठन के समय वर्ष 2000 में उन्हें भाजपा महानगर अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया। यह वह दौर था जब भाजपा उत्तराखंड में अपने राजनीतिक भविष्य की मजबूत नींव रख रही थी। संगठन के भीतर लगातार बढ़ता विश्वास इस बात का संकेत था कि गामा केवल एक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि नेतृत्व क्षमता वाले संगठनकर्ता के रूप में स्थापित हो चुके थे।
सुनील उनियाल गामा की राजनीतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष उत्तराखंड आंदोलन से भी जुड़ा है। राज्य आंदोलन के दौरान उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई और जेल भरो आंदोलनों में हिस्सा लिया। उत्तराखंड राज्य निर्माण की लड़ाई में उनकी उपस्थिति उन्हें उन नेताओं की श्रेणी में खड़ा करती है जिनका राजनीतिक आधार केवल चुनावी राजनीति नहीं बल्कि जनांदोलनों से भी जुड़ा रहा है। राम जन्मभूमि आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही और कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा। भाजपा के वैचारिक आंदोलनों में उनकी यह सक्रियता आज भी पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता का एक प्रमुख कारण मानी जाती है।
संगठन में उनकी यात्रा लगातार आगे बढ़ती रही। वर्ष 2004 में उन्हें भाजपा प्रदेश मंत्री बनाया गया। 2007 में भाजपा महानगर उपाध्यक्ष और राजपुर तथा मसूरी विधानसभा क्षेत्रों का सह-संयोजक बनाया गया। 2010 में उन्होंने भाजपा महानगर महामंत्री के रूप में कार्य किया। 2012 के टिहरी लोकसभा उपचुनाव में राजपुर विधानसभा संयोजक की जिम्मेदारी निभाई। 2013 में प्रदेश कार्यसमिति सदस्य बने और 2015 तथा 2018 में पुनः प्रदेश मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले नेताओं की सबसे बड़ी ताकत उनका संगठनात्मक नेटवर्क होता है। गामा का भी यही सबसे मजबूत पक्ष माना जाता है। वे उन नेताओं में हैं जिनकी पहचान चुनाव के समय सक्रिय होने वाले नेता की नहीं बल्कि सालभर संगठन और जनता के बीच रहने वाले कार्यकर्ता की रही है।
हालांकि उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 2018 में आया, जब भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें देहरादून नगर निगम के मेयर पद का उम्मीदवार बनाया। उस समय कांग्रेस ने पूर्व मंत्री दिनेश अग्रवाल जैसे मजबूत चेहरे को मैदान में उतारा था, लेकिन गामा ने निर्णायक जीत दर्ज की और देहरादून के मेयर बने। देहरादून नगर निगम चुनाव में उनकी जीत ने उन्हें राज्यस्तरीय पहचान प्रदान की।
देहरादून के मेयर के रूप में उन्होंने 2018 से 2023 तक कार्य किया। नगर निगम की जिम्मेदारी संभालते समय उन्होंने शहर की सफाई व्यवस्था, कूड़ा निस्तारण और बुनियादी शहरी सुविधाओं को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल बताया था। शपथ ग्रहण के समय भी उन्होंने शहर की कचरा समस्या को प्रमुख चुनौती बताया था।
मेयर के रूप में उनका कार्यकाल राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि देहरादून तेजी से विस्तार कर रहा था और नगर निगम को बढ़ती आबादी, यातायात, कूड़ा प्रबंधन, अवैध निर्माण तथा शहरी नियोजन जैसी जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। इस अवधि ने गामा को प्रशासनिक अनुभव दिया और उन्हें देहरादून के शहरी मतदाताओं के बीच एक पहचान भी प्रदान की।
राजनीति में व्यक्तित्व की विश्वसनीयता अक्सर संघर्षों से बनती है। सुनील उनियाल गामा का जीवन भी इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है। विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्टों में उल्लेख मिलता है कि युवावस्था में उन्होंने आर्थिक संघर्षों का सामना किया और छोटे-मोटे व्यवसाय करते हुए अपना जीवन आगे बढ़ाया। बाद में राजनीति और सामाजिक जीवन में सक्रियता ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई।
मेयर पद के बाद भी उनकी सक्रियता कम नहीं हुई। उन्हें मेयर काउंसिल ऑफ उत्तराखंड का अध्यक्ष बनने का अवसर मिला। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय स्तर पर भी विभिन्न मंचों में उनकी भागीदारी रही। इससे उनका राजनीतिक दायरा देहरादून नगर निगम की सीमाओं से आगे बढ़कर राज्यव्यापी स्वरूप ग्रहण करता गया।
अब यदि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न मसूरी विधानसभा को लेकर है। आखिर क्यों राजनीतिक गलियारों में सुनील उनियाल गामा का नाम लगातार चर्चा में है?
इसका पहला कारण उनका संगठनात्मक अनुभव है। भाजपा में टिकट वितरण केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं होता, बल्कि संगठन के प्रति समर्पण और वर्षों की सक्रियता भी महत्वपूर्ण कारक होते हैं। इस दृष्टि से गामा का रिकॉर्ड मजबूत माना जाता है।
दूसरा कारण उनकी प्रशासनिक पृष्ठभूमि है। भाजपा के पास मसूरी विधानसभा के लिए ऐसे चेहरे सीमित हैं जो संगठन, प्रशासन और जनाधार—तीनों का संतुलन प्रस्तुत कर सकें। गामा इस श्रेणी में फिट बैठते दिखाई देते हैं।
तीसरा कारण उनका क्षेत्रीय जुड़ाव है। राजपुर और मसूरी क्षेत्र के साथ उनका संगठनात्मक संबंध नया नहीं है। वर्षों पहले वे इन क्षेत्रों में पार्टी के सह-संयोजक की भूमिका निभा चुके हैं। इसलिए स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की समझ भी उनके पक्ष में जाती है।
चौथा कारण देहरादून नगर निगम के दौरान विकसित हुआ व्यापक जनसंपर्क नेटवर्क है। मसूरी विधानसभा का एक बड़ा हिस्सा देहरादून से जुड़े शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों से प्रभावित होता है। ऐसे में एक पूर्व मेयर के रूप में उनकी पहचान चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
हालांकि राजनीतिक यथार्थ यह भी कहता है कि मसूरी विधानसभा में भाजपा के भीतर अन्य दावेदार भी मौजूद हो सकते हैं। पार्टी की चुनावी रणनीति, सामाजिक समीकरण, जातीय संतुलन और स्थानीय परिस्थितियां टिकट वितरण में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। इसलिए किसी भी नेता के लिए टिकट को निश्चित मानना जल्दबाजी होगी।
फिर भी यदि वर्तमान परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाए तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सुनील उनियाल गामा उन नेताओं में शामिल हैं जिनकी दावेदारी को गंभीरता से लिया जा रहा है। उनका संगठनात्मक अनुभव, राज्य आंदोलन की पृष्ठभूमि, भाजपा में दीर्घकालिक सक्रियता, देहरादून के मेयर के रूप में प्रशासनिक अनुभव और कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्यता उन्हें स्वाभाविक रूप से मजबूत दावेदारों की सूची में खड़ा करती है।
उत्तराखंड की राजनीति में ऐसे बहुत कम नेता हैं जिन्होंने वार्ड स्तर से शुरुआत करके जिला, महानगर, प्रदेश संगठन और फिर नगर निगम के सर्वोच्च पद तक की यात्रा तय की हो। सुनील उनियाल गामा की राजनीतिक कहानी इसी कारण अलग दिखाई देती है। यह कहानी किसी राजनीतिक विरासत की नहीं, बल्कि लगातार संगठन में काम करने, संघर्ष करने और अवसर मिलने पर उसे नेतृत्व में बदल देने की कहानी है।
आने वाले समय में भाजपा मसूरी विधानसभा के लिए किस चेहरे पर दांव लगाएगी, इसका अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व करेगा। लेकिन वर्तमान राजनीतिक संकेत यह अवश्य बताते हैं कि यदि अनुभव, संगठनात्मक प्रतिबद्धता, प्रशासनिक पृष्ठभूमि और स्थानीय स्वीकार्यता को आधार बनाया गया, तो सुनील उनियाल ‘गामा’ का नाम उन प्रमुख चेहरों में रहेगा जिन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। उत्तराखंड की राजनीति में उनकी भूमिका अब केवल पूर्व मेयर तक सीमित नहीं रह गई है; वे धीरे-धीरे विधानसभा राजनीति के एक संभावित और प्रभावशाली दावेदार के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।
