नई दिल्ली: आर्थिक सर्वेक्षण 2026 ने भारतीय राजनीति में तेजी से बढ़ रही निःशुल्क लाभ योजनाओं पर गंभीर चिंता जताई है। सर्वेक्षण के अनुसार, राज्यों में चुनावी दौर के दौरान बिना शर्त नकद सहायता देने की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है, जो अब कल्याणकारी उपाय से अधिक एक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का रूप ले चुकी है। सर्वेक्षण ने चेताया है कि यह प्रवृत्ति भारत की दीर्घकालीन आर्थिक वृद्धि के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।
सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025–26 में लगभग ₹1.7 ट्रिलियन की राशि बिना किसी शर्त के नकद सहायता के रूप में वितरित की गई। ये योजनाएँ मनरेगा या मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं से अलग हैं, जहाँ काम, शिक्षा या उपस्थिति जैसी शर्तें जुड़ी होती हैं। वर्ष 2022 के बाद से ऐसी नकद योजनाओं पर खर्च पाँच गुना बढ़ गया है और कुछ राज्यों में यह खर्च कुल बजट के 8 प्रतिशत तक पहुँच चुका है।
आर्थिक सर्वेक्षण ने बताया कि इससे राज्यों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा है। राज्यों का संयुक्त वित्तीय घाटा बढ़कर 3.2 प्रतिशत हो गया है और राजस्व घाटा फिर से सामने आया है, जिसका अर्थ है कि सरकारें अब रोज़मर्रा के खर्चों के लिए भी उधार ले रही हैं। सर्वेक्षण ने यह भी कहा कि निःशुल्क नकद सहायता पर बढ़ता खर्च शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से संसाधन छीन रहा है।
इसके अलावा, सर्वेक्षण ने चेतावनी दी कि बड़ी मात्रा में बिना शर्त नकद सहायता से श्रम बाजार प्रभावित हो सकता है और कम मजदूरी वाले कार्यों के लिए श्रमिकों की कमी पैदा हो सकती है। साथ ही, एक राज्य द्वारा ऐसी योजना शुरू करने से अन्य राज्यों पर भी वैसा ही करने का राजनीतिक दबाव बनता है।
आर्थिक सर्वेक्षण ने स्पष्ट किया कि वह कल्याणकारी नीतियों के खिलाफ नहीं है, लेकिन उसने विकास समर्थक कल्याण पर ज़ोर दिया है। ब्राज़ील और मेक्सिको जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि नकद सहायता को शिक्षा और स्वास्थ्य से जोड़कर बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। सर्वेक्षण ने निष्कर्ष में कहा कि भारत की युवा आबादी एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिसे अल्पकालिक नकद सहायता की बजाय कौशल, शिक्षा और मानव पूंजी में निवेश करके मजबूत किया जाना चाहिए।
